Human consciousness/hi: Difference between revisions
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Revision as of 12:48, 25 March 2024
वह चेतना जो स्वयं को सिर्फ हाड-मांस से बने इस शरीर के रूप में पहचानती है - यह सीमित ज्ञान है जो मनुष्य को नश्वर, पतित, पापी, त्रुटिओं का पुतला और इंद्रियों के अधीन गुनाहों का देवता मानती है। और इसी कारण मानवी चेतना मनुष्य के पुत्र के साथ घोषणा करती है: "मैं एक तुच्छ मानव हूं" और स्वयं से कुछ नहीं कर सकता। मुझ में निहित पिता का रूप (ईश्वरीय स्वरूप) ही भगवान् के सारे कार्य करता है।[1]
इसे भी देखिये
दहलीज़ पर रहने वाला हमारा नकरात्मक रूप
Sources
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, Saint Germain On Alchemy: Formulas for Self-Transformation.
- ↑ जॉन ५:३०; १४:१०.