Saint Germain/hi: Difference between revisions
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{{main-hi|Merlin|मर्लिन}} | {{main-hi|Merlin|मर्लिन}} | ||
पाँचवीं शताब्दी में संत जरमेन मर्लिन (Merlin) के रूप में अवतरित हुए। वह [[Special:MyLanguage/King Arthur|राजा आर्थर]] (King Arthur) के दरबार में एक रसायनशास्त्री थे, भविष्यवक्ता और सलाहकार के रूप में कार्य करते थे। युद्धरत सामंतों (warring chieftains) से विखंडित (splintered) और सैक्सन आक्रमणकारियों (Saxon invaders) से त्रस्त भूमि में मर्लिन ने ब्रिटेन के राज्य को एकजुट करने के लिए बारह युद्धों (जो वास्तव में बारह दीक्षाएँ थीं) में आर्थर का नेतृत्व किया। उन्होंने [[Special:MyLanguage/Round Table|राउंड टेबल]] की पवित्र अध्येतावृत्ति स्थापित करने के लिए राजा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। मर्लिन और आर्थर के मार्गदर्शन में कैमलॉट (Camelot) [[Special:MyLanguage/mystery school|रहस्य का | पाँचवीं शताब्दी में संत जरमेन मर्लिन (Merlin) के रूप में अवतरित हुए। वह [[Special:MyLanguage/King Arthur|राजा आर्थर]] (King Arthur) के दरबार में एक रसायनशास्त्री थे, भविष्यवक्ता और सलाहकार के रूप में कार्य करते थे। युद्धरत सामंतों (warring chieftains) से विखंडित (splintered) और सैक्सन आक्रमणकारियों (Saxon invaders) से त्रस्त भूमि में मर्लिन ने ब्रिटेन के राज्य को एकजुट करने के लिए बारह युद्धों (जो वास्तव में बारह दीक्षाएँ थीं) में आर्थर का नेतृत्व किया। उन्होंने [[Special:MyLanguage/Round Table|राउंड टेबल]] (Round Table) की पवित्र अध्येतावृत्ति स्थापित करने के लिए राजा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। मर्लिन और आर्थर के मार्गदर्शन में कैमलॉट (Camelot) [[Special:MyLanguage/mystery school|रहस्य का विद्यालय]] (mystery school) था जहाँ वीर पुरुष और स्त्रियां (knights and ladies) [[Special:MyLanguage/Holy Grail|होली ग्रेल]] (Holy Grail) के रहस्यों को जानने के लिए अध्ययन करते थे, और स्वयं का आध्यात्मिक विकास भी करते थे। | ||
कुछ परंपराओं में मर्लिन को एक ईश्वरीय ऋषि के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने तारों का अध्ययन किया और जिनकी भविष्यवाणियाँ सत्तर सचिवों (seventy secretaries) द्वारा दर्ज की गईं। "द प्रोफेसीस ऑफ मर्लिन" (''The Prophecies of Merlin''), जो आर्थर के समय से लेकर सुदूर भविष्य तक की घटनाओं का वर्णन करती है, मध्य युग में अत्यंत लोकप्रिय थी। | कुछ परंपराओं में मर्लिन को एक ईश्वरीय ऋषि के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने तारों का अध्ययन किया और जिनकी भविष्यवाणियाँ सत्तर सचिवों (seventy secretaries) द्वारा दर्ज की गईं। "द प्रोफेसीस ऑफ मर्लिन" (''The Prophecies of Merlin''), जो आर्थर के समय से लेकर सुदूर भविष्य तक की घटनाओं का वर्णन करती है, मध्य युग में अत्यंत लोकप्रिय थी। | ||
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{{Main-hi|Roger Bacon|रोजर बेकन}} | {{Main-hi|Roger Bacon|रोजर बेकन}} | ||
संत जरमेन एक जन्म में रोजर बेकन (Roger Bacon) ( | संत जरमेन एक जन्म में रोजर बेकन (Roger Bacon) (1220–1292) थे। बेकन के रूप में वह एक दार्शनिक, फ्रांसिस्कन भिक्षु, शिक्षाविद्, शैक्षिक सुधारक और प्रयोगात्मक वैज्ञानिक थे। वह एक ऐसा युग था जब विज्ञान का मापदंड धर्म और तर्क पर आधारित था, और ऐसे समय में बेकन ने विज्ञान में प्रयोगात्मक पद्धति को बढ़ावा दिया; उन्होंने कहा कि दुनिया गोल है - उन्होंने उस समय के विद्वानों और वैज्ञानिकों की संकीर्ण विचारधारा की निंदा की। उन्होंने कहा कि "सच्चा ज्ञान दूसरों के अधिकार से नहीं उत्पन्न होता और ना ही यह पुरातनपंथी सिद्धांतों (blind allegiance) के प्रति अंधश्रद्धा (antiquated dogmas) से उपजता है।" <ref>हेनरी थॉमस एंड डाना ली थॉमस, ''लिविंग बायोग्राफीज़ ऑफ़ ग्रेट साइंटिस्ट्स'' (गार्डन सिटी, न्यूयॉर्क: नेल्सन डबलडे, 1941), पृष्ठ 15. | ||
</ref><ref>Henry Thomas and Dana Lee Thomas, ''Living Biographies of Great Scientists'' (Garden City, N.Y.: Nelson Doubleday, 1941), p. 15.</ref> | |||
अंततः बेकन ने पेरिस विश्वविद्यालय में व्याख्याता का पद छोड़ दिया और फ्रांसिस्कन ऑर्डर ऑफ़ फ्रायर्स माइनर (Franciscan Order of Friars Minor) में शामिल हो गए। | अंततः बेकन ने पेरिस विश्वविद्यालय में व्याख्याता का पद छोड़ दिया और फ्रांसिस्कन ऑर्डर ऑफ़ फ्रायर्स माइनर (Franciscan Order of Friars Minor) में शामिल हो गए। | ||
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उनके वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण, धर्मशास्त्रियों पर उनके आक्षेपों और रसायन विद्या तथा ज्योतिष शास्त्र के उनके ज्ञान के कारण उन पर "विधर्मी और असमान्य" (“heresies and novelties”) होने के आरोप लगे। इन सब बातों के लिए उनके साथी फ्रांसिस्कन (Franciscans) लोगों ने उन्हें चौदह साल के लिए कारावास में डाल दिया। लेकिन अपने अनुयायियों के लिए बेकन "डॉक्टर मिराबिलिस" (“doctor mirabilis”) ("अद्भुत शिक्षक") थे - यह एक ऐसी उपाधि है जिससे उन्हें सदियों से जाना जाता रहा है। | उनके वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण, धर्मशास्त्रियों पर उनके आक्षेपों और रसायन विद्या तथा ज्योतिष शास्त्र के उनके ज्ञान के कारण उन पर "विधर्मी और असमान्य" (“heresies and novelties”) होने के आरोप लगे। इन सब बातों के लिए उनके साथी फ्रांसिस्कन (Franciscans) लोगों ने उन्हें चौदह साल के लिए कारावास में डाल दिया। लेकिन अपने अनुयायियों के लिए बेकन "डॉक्टर मिराबिलिस" (“doctor mirabilis”) ("अद्भुत शिक्षक") थे - यह एक ऐसी उपाधि है जिससे उन्हें सदियों से जाना जाता रहा है। | ||
[[File:Portrait of a Man, Said to be Christopher Columbus.jpg|thumb|left|alt=caption|सेबेस्टियानो डेल पियोम्बो द्वारा बनाया गया क्रिस्टोफर कोलंबस का उनका मरणोपरांत चित्र ( | [[File:Portrait of a Man, Said to be Christopher Columbus.jpg|thumb|left|alt=caption|सेबेस्टियानो डेल पियोम्बो द्वारा बनाया गया क्रिस्टोफर कोलंबस का उनका मरणोपरांत चित्र (1519) [Posthumous portrait of Christopher Columbus by Sebastiano del Piombo (1519)]]] | ||
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{{Main-hi|Christopher Columbus|क्रिस्टोफर कोलंबस}} | {{Main-hi|Christopher Columbus|क्रिस्टोफर कोलंबस}} | ||
एक अन्य जन्म में संत जरमेन अमेरिका के आविष्कारक क्रिस्टोफर कोलंबस (Christopher Columbus) (१४५१-१५०६) थे। कोलंबस के जन्म से दो शताब्दी से भी अधिक समय पहले रोजर बेकन ( Roger Bacon) कोलंबस की यात्रा के लिए मंच तैयार किया था - उन्होंने अपनी पुस्तक ''ओपस माजस'' (Opus Majus) में लिखा था कि "यदि मौसम अनुकूल हो तो पश्चिम में स्पेन के अंत और पूर्व में भारत की शुरुआत के बीच का समुद्र की यात्रा कुछ ही दिनों की जा सकती है।"<ref>डेविड | एक अन्य जन्म में संत जरमेन अमेरिका के आविष्कारक क्रिस्टोफर कोलंबस (Christopher Columbus) (१४५१-१५०६) थे। कोलंबस के जन्म से दो शताब्दी से भी अधिक समय पहले रोजर बेकन ( Roger Bacon) कोलंबस की यात्रा के लिए मंच तैयार किया था - उन्होंने अपनी पुस्तक ''ओपस माजस'' (Opus Majus) में लिखा था कि "यदि मौसम अनुकूल हो तो पश्चिम में स्पेन के अंत और पूर्व में भारत की शुरुआत के बीच का समुद्र की यात्रा कुछ ही दिनों की जा सकती है।" <ref>डेविड वालेचिन्स्की, एमी वालेस और इरविंग वालेस द्वारा लिखित पुस्तक The Book of Predictions (न्यूयॉर्क: विलियम मॉरो एंड कंपनी, 1980), पृष्ठ 346।</ref> [David Wallechinsky, Amy Wallace and Irving Wallace, ''The Book of Predictions'' (New York: William Morrow and Co., 1980), p. 346.] | ||
"हालाँकि यह कथन गलत था कि स्पेन के पश्चिम में स्थित भूमि भारत थी, फिर भी यह कोलंबस की खोज में सहायक साबित हुआ। उन्होंने इस अंश को 1498 में राजा फर्डिनेंड और रानी इसाबेला को लिखे एक पत्र में उद्धृत किया और कहा कि उनकी 1492 की यात्रा आंशिक रूप से इसी दूरदर्शी कथन से प्रेरित थी।" | |||
कोलंबस का मानना था कि ईश्वर ने उन्हें "नए स्वर्ग और नई पृथ्वी का संदेशवाहक बनाया था, जिसके बारे में उन्होंने अपोकलीप्स ऑफ़ सेंट जॉन (Apocalypse of St. John), में लिखा था, आईज़ेयाह (Isaiah) ने भी इसके बारे में कहा था। "इंडीज के इस उद्यम को अंजाम देने में, (“In the carrying out of this enterprise of the Indies)“क्लेमेंट्स आर. मार्कहैम द्वारा लिखित पुस्तक Life of Christopher Columbus (लंदन: जॉर्ज फिलिप एंड सन, 1892), पृष्ठ 207–208।” [<ref>Clements R. Markham, Life of Christopher Columbus (London: George Philip and Son, 1892), pp. 207–8.</ref>] उन्होंने 1502 में राजा फर्डिनेंड और रानी इसाबेला को लिखा, "आईज़ेयाह पूरी तरह से सही कहा था - तर्क, गणित, या नक्शे मेरे किसी काम के नहीं थे।" कोलंबस आईज़ेयाह (Isaiah) की 11:10–12 में दर्ज भविष्यवाणी का उल्लेख कर रहे थे कि प्रभु “अपनी प्रजा के बचे हुओं को बचा लेंगे... और इजराइल के निकाले हुओं को इकट्ठा करेंगे, और पृथ्वी की चारों दिशाओं से जुडाह के बिखरे हुओं को इकट्ठा करेंगे।” | |||
“एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका (15वाँ संस्करण), विषय प्रविष्टि: ‘क्रिस्टोफर कोलंबस’।” [<ref>''Encyclopaedia Britannica'', 15th ed., s.v. “Columbus, Christopher.”</ref>] | |||
उन्हें पूरा विश्वास था कि ईश्वर ने ही उन्हें इस मिशन के लिए चुना है। उन्होंने बाइबल में लिखी भविष्यवाणियों को पढ़ा और अपने मिशन से संबंधित बातों को अपनी एक पुस्तक में लिखा, जिसका शीर्षक था Las Profecías (या The Prophecies)—इसके पूर्ण रूप में इसका नाम था The Book of Prophecies concerning the Discovery of the Indies and the Recovery of Jerusalem (इंडीज़ की खोज और यरूशलम की पुनः प्राप्ति से संबंधित भविष्यवाणियों की पुस्तक)। हालाँकि इस बात पर कम ही ज़ोर दिया जाता है, लेकिन यह एक माना हुआ तथ्य है तथा इसके बारे में "एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका" (Encyclopaedia Britannica) में भी स्पष्ट रूप से लिखा है कि "कोलंबस ने खगोल विज्ञान नहीं वरन भविष्यवाणी का अनुसरण कर अमरीका की खोज की थी।" | |||
उन्हें पूरा विश्वास था कि ईश्वर ने ही उन्हें इस मिशन के लिए चुना है। उन्होंने | |||
[[File:Francis Bacon, Viscount St Alban from NPG (2).jpg|thumb|upright|alt=caption|फ्रांसिस बेकन, विस्काउंट सेंट एल्बन, एक अज्ञात कलाकार द्वारा बनाया चित्र]] | [[File:Francis Bacon, Viscount St Alban from NPG (2).jpg|thumb|upright|alt=caption|फ्रांसिस बेकन, विस्काउंट सेंट एल्बन, एक अज्ञात कलाकार द्वारा बनाया चित्र (Francis Bacon, Viscount St Alban, by unknown artist)]] | ||
<span id="Francis_Bacon"></span> | <span id="Francis_Bacon"></span> | ||
=== फ्रांसिस बेकन === | === फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) === | ||
{{Main-hi|Francis Bacon|फ्रांसिस बेकन}} | {{Main-hi|Francis Bacon|फ्रांसिस बेकन}} | ||
फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) ( | फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) (1561–1626) एक दार्शनिक, राजनेता, निबंधकार और साहित्यकार थे। बेकन को पश्चिम का अब तक का सबसे बड़ा ज्ञानी और विचारक (greatest mind the West ever produced) कहा जाता है। वह आगमनात्मक तर्क और वैज्ञानिक पद्धति (father of inductive reasoning and the scientific method) के जनक माने जाते हैं। वह काफी हद तक इस तकनीकी युग के लिए ज़िम्मेदार हैं जिसमें हम आज जी रहे हैं। वह जानते थे कि केवल व्यावहारिक विज्ञान ही जनसाधारण को मानवीय कष्टों और मानव जीवन की नीरसता से मुक्ति दिला सकता है और ऐसा होने पर ही मनुष्य आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो सकता है, व् उस उत्तम आध्यात्मिकता की पुनः खोज कर सकता है जिसे वह पहले कभी अच्छी तरह से जानता था। | ||
"महान असंतृप्ति" (“The Great Instauration”) (अर्थात पतन, नाश , गलतियों, और जीर्णावस्था के बाद वृहद् पुनर्स्थापना) "संपूर्ण विश्व" को बदलने का उनका तरीका था। इस बात की अवधारणा पहली बार उन्होंने बचपन में की थी। फिर १६०७, में उन्होंने इसी नाम से अपनी पुस्तक में इसे मूर्त रूप दिया। इसके बाद अंग्रेजी पुनर्जागरण की शुरुआत की। | "महान असंतृप्ति" (“The Great Instauration”) (अर्थात पतन, नाश , गलतियों, और जीर्णावस्था के बाद वृहद् पुनर्स्थापना) "संपूर्ण विश्व" को बदलने का उनका तरीका था। इस बात की अवधारणा पहली बार उन्होंने बचपन में की थी। फिर १६०७, में उन्होंने इसी नाम से अपनी पुस्तक में इसे मूर्त रूप दिया। इसके बाद अंग्रेजी पुनर्जागरण (Renaissance) की शुरुआत की। | ||
समय के साथ-साथ बेकन ने अपने आसपास कुछ ऐसे लेखकों को एकत्र किया जो एलिज़ाबेथकालीन साहित्य (Elizabethan literature) के लिए ज़िम्मेदार थे। इनमें से कुछ एक "गुप्त संस्था" (secret society) - "द नाइट्स ऑफ़ द हेलमेट" (The Knights of the Helmet) के सदस्य थे। इस संस्था का लक्ष्य अंग्रेजी भाषा का विस्तार करना था और एक ऐसे नए साहित्य की रचना करना था जिसे अंग्रेज लोग समझ पाएं। बेकन ने [[Special:MyLanguage/Bible translations|बाइबल के अनुवाद]] (किंग जेम्स का संस्करण) का भी आयोजन किया - उनका यह दृढ़ निश्चय था कि साधारण लोगों को भी ईश्वर के कहे शब्दों को पढ़ने का मौका मिलना चाहिए। | समय के साथ-साथ बेकन ने अपने आसपास कुछ ऐसे लेखकों को एकत्र किया जो एलिज़ाबेथकालीन साहित्य (Elizabethan literature) के लिए ज़िम्मेदार थे। इनमें से कुछ एक "गुप्त संस्था" (secret society) - "द नाइट्स ऑफ़ द हेलमेट" (The Knights of the Helmet) के सदस्य थे। इस संस्था का लक्ष्य अंग्रेजी भाषा का विस्तार करना था और एक ऐसे नए साहित्य की रचना करना था जिसे अंग्रेज लोग समझ पाएं। बेकन ने [[Special:MyLanguage/Bible translations|बाइबल के अनुवाद]] (किंग जेम्स का संस्करण) का भी आयोजन किया - उनका यह दृढ़ निश्चय था कि साधारण लोगों को भी ईश्वर के कहे शब्दों को पढ़ने का मौका मिलना चाहिए। | ||
1890 के दशक में शेक्सपियर के नाटकों के मूल मुद्रणों (original printings) और बेकन तथा अन्य एलिज़ाबेथ काल के लेखकों की कृतियों में लिखे सांकेतिक शब्दों से यह आभास होता है कि बेकन ने शेक्सपियर के नाटक लिखे थे और वह महारानी एलिजाबेथ और लॉर्ड लीसेस्टर (Queen Elizabeth and Lord Leicester) के पुत्र थे।<ref>देखें{{TSC}}.</ref> हालाँकि उनकी माँ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया क्योंकि वह डरती थीं की सत्ता उचित समय से पहले भी उनके हाथ से निकल सकती है। | |||
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और उनकी बहुमुखी प्रतिभाओं को उचित पहचान नहीं मिली। कहा जाता है कि उनका निधन 1626 में हुआ, किंतु कुछ लोगों का दावा है कि इसके बाद भी वे कुछ समय तक गुप्त रूप से यूरोप में जीवित | अपने जीवन के अंतिम वर्षों में फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और उनकी बहुमुखी प्रतिभाओं को उचित पहचान नहीं मिली। कहा जाता है कि उनका निधन 1626 में हुआ, किंतु कुछ लोगों का दावा है कि इसके बाद भी वे कुछ समय तक गुप्त रूप से यूरोप में जीवित रहे। ऐसी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करते हुए, जो साधारण व्यक्तियों को नष्ट कर सकती थीं, उनकी आत्मा ने 1 मई 1684 को राकोज़ी मेंशन (Rakoczy Mansion) से, जो महान दिव्य निर्देशक (Great Divine Director) का निवास-स्थल माना जाता है, तथाकथित आरोहण (Ascension) के अनुष्ठान में प्रवेश किया। | ||
[[File:Count of St Germain.jpg|thumb|upright|ले कॉम्टे डे संत जर्मेन (Le Comte de Saint Germain)]] | [[File:Count of St Germain.jpg|thumb|upright|ले कॉम्टे डे संत जर्मेन (Le Comte de Saint Germain)]] | ||
[[File:Rembrandt - De Poolse ruiter, c.1655 (Frick Collection).jpg|thumb|upright=1.2| | [[File:Rembrandt - De Poolse ruiter, c.1655 (Frick Collection).jpg|thumb|upright=1.2|द पोलिश राइडर,” रेम्ब्रांट (लगभग 1655), जिसमें सेंट जर्मेन को यूरोप के ‘वंडरमैन’ के रूप में उनके अवतार में दर्शाया गया है।”<ref>मार्क प्रॉफेट, 29 दिसंबर 1967</ref> | ||
[''The Polish Rider,'' Rembrandt (c. 1655), depicting Saint Germain in his embodiment as the Wonderman of Europe<ref>Mark Prophet, December 29, 1967</ref>]]] | |||
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{{Main-hi|Wonderman of Europe|यूरोप का अजूबा आदमी}} | {{Main-hi|Wonderman of Europe|यूरोप का अजूबा आदमी}} | ||
लोगों को मुक्ति दिलाने की सर्वोपरि इच्छा रखते हुए संत जरमेन ने [[Special:MyLanguage/Lords of Karma|कर्म के स्वामी]] से भौतिक शरीर में पृथ्वी पर लौटने की अनुमति मांगी और उन्हें यह अनुमति मिल भी गई। वह "ले कॉम्टे डे सेंट जरमेन" (le Comte de Saint Germain) के रूप में प्रकट हुए - "अलौकिक गुणों वाला सज्जन व्यक्ति" जिन्होंने अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के समय यूरोप के दरबारों को चकित कर दिया था। यहीं से उन्हें "द वंडरमैन (अद्भुत व्यक्ति)" का खिताब मिला। | लोगों को मुक्ति दिलाने की सर्वोपरि इच्छा रखते हुए संत जरमेन ने [[Special:MyLanguage/Lords of Karma|कर्म के स्वामी]] (Lords of Karma) से भौतिक शरीर में पृथ्वी पर लौटने की अनुमति मांगी और उन्हें यह अनुमति मिल भी गई। वह "ले कॉम्टे डे सेंट जरमेन" (le Comte de Saint Germain) के रूप में प्रकट हुए - "अलौकिक गुणों वाला सज्जन व्यक्ति" जिन्होंने अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के समय यूरोप के दरबारों को चकित कर दिया था। यहीं से उन्हें "द वंडरमैन (अद्भुत व्यक्ति)" का खिताब मिला। | ||
वे एक आद्यवैज्ञानिक, विद्वान, भाषाविद्, कवि, संगीतकार, कलाकार, कथाकार और राजनयिक थे। यूरोप के दरबारों में उनकी काफी प्रशंसा की जाती थी। उन्हें मणियों की पहचान थी, उन्हें हीरे और अन्य रत्नों में दोष निकालने के लिए जाना जाता था। साथ ही उन्हें एक हाथ से पत्र और दूसरे हाथ से कविता लिखने जैसे कार्य के लिए भी जाना जाता था। वोल्टेयर के शब्दों में "वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो कभी नहीं मर सकता, और जो सब कुछ जानता है।"<ref>वोल्टेयर (Voltaire), ''ओयूव्रेस'', लेट्रे cxviii, सं. बेउचोट, lviii, पृष्ठ ३६०, इसाबेल कूपर-ओकले, ''द काउंट ऑफ़ सेंट जर्मेन''(The Count of Saint Germain) (ब्लौवेल्ट, एन.वाई.: रुडोल्फ स्टीनर पब्लिकेशंस (Rudolf Steiner Publications), १९७०), पृष्ठ ९६ में उद्धृत।</ref> उनका उल्लेख फ्रेडरिक द ग्रेट (Frederick the Great), वोल्टेयर (Voltaire), होरेस वालपोल (Horace Walpole) और कैसानोवा (Casanova) के पत्रों और उस समय के समाचार पत्रों में मिलता है। | वे एक आद्यवैज्ञानिक, विद्वान, भाषाविद्, कवि, संगीतकार, कलाकार, कथाकार और राजनयिक थे। यूरोप के दरबारों में उनकी काफी प्रशंसा की जाती थी। उन्हें मणियों की पहचान थी, उन्हें हीरे और अन्य रत्नों में दोष निकालने के लिए जाना जाता था। साथ ही उन्हें एक हाथ से पत्र और दूसरे हाथ से कविता लिखने जैसे कार्य के लिए भी जाना जाता था। वोल्टेयर के शब्दों में "वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो कभी नहीं मर सकता, और जो सब कुछ जानता है।"<ref>वोल्टेयर (Voltaire), ''ओयूव्रेस'', लेट्रे cxviii, सं. बेउचोट, lviii, पृष्ठ ३६०, इसाबेल कूपर-ओकले, ''द काउंट ऑफ़ सेंट जर्मेन''(The Count of Saint Germain) (ब्लौवेल्ट, एन.वाई.: रुडोल्फ स्टीनर पब्लिकेशंस (Rudolf Steiner Publications), १९७०), पृष्ठ ९६ में उद्धृत।</ref> उनका उल्लेख फ्रेडरिक द ग्रेट (Frederick the Great), वोल्टेयर (Voltaire), होरेस वालपोल (Horace Walpole) और कैसानोवा (Casanova) के पत्रों और उस समय के समाचार पत्रों में मिलता है। | ||
परदे के पीछे से संत जरमेन यह प्रयास कर रहे थे कि [[Special:MyLanguage/French Revolution|फ्रांसीसी क्रांति]] बिना रक्तपात के हो जाए - राजतंत्र को प्रजातंत्र में आराम से बदल दिया जाए ताकि जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार हो। लेकिन उनकी इस सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यूरोप को एकजुट करने के अपने अंतिम प्रयास में उन्होंने [[Special:MyLanguage/Napoleon|नेपोलियन]] (Napoleon) का समर्थन किया, परन्तु नेपोलियन ने अपने गुरु की शक्तियों का दुरुपयोग किया और मृत्यु को प्राप्त किया। | परदे के पीछे से संत जरमेन यह प्रयास कर रहे थे कि [[Special:MyLanguage/French Revolution|फ्रांसीसी क्रांति]] (फ्रांसीसी क्रांति) बिना रक्तपात के हो जाए - राजतंत्र को प्रजातंत्र में आराम से बदल दिया जाए ताकि जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार हो। लेकिन उनकी इस सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यूरोप को एकजुट करने के अपने अंतिम प्रयास में उन्होंने [[Special:MyLanguage/Napoleon|नेपोलियन]] (Napoleon) का समर्थन किया, परन्तु नेपोलियन ने अपने गुरु की शक्तियों का दुरुपयोग किया और मृत्यु को प्राप्त किया। | ||
लेकिन इससे भी पहले संत जरमेन ने अपना ध्यान एक नई दुनिया की ओर मोड़ लिया था। वे संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) और उसके [[Special:MyLanguage/George Washington|प्रथम राष्ट्रपति]] (George Washington) के प्रायोजक बने। स्वतंत्रता की घोषणा और संविधान उन्हीं से प्रेरित था। उन्होंने कई ऐसे उपकरणों को बनाने की प्रेरणा भी दी जिनसे शारीरिक श्रम का कम से कम उपयोग हो ताकि मानवजाति कठिन परिश्रम से मुक्त होकर ईश्वर-प्राप्ति के रास्ते पर चल सके। | लेकिन इससे भी पहले संत जरमेन ने अपना ध्यान एक नई दुनिया की ओर मोड़ लिया था। वे संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) और उसके [[Special:MyLanguage/George Washington|प्रथम राष्ट्रपति]] (George Washington) के प्रायोजक बने। स्वतंत्रता की घोषणा और संविधान उन्हीं से प्रेरित था। उन्होंने कई ऐसे उपकरणों को बनाने की प्रेरणा भी दी जिनसे शारीरिक श्रम का कम से कम उपयोग हो ताकि मानवजाति कठिन परिश्रम से मुक्त होकर ईश्वर-प्राप्ति के रास्ते पर चल सके। | ||
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अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, संत जरमेन ने महिला दिव्यगुरु [[Special:MyLanguage/Kuan Yin|कुआन यिन]] से सातवीं किरण चौहान का पद प्राप्त किया। सातवीं किरण दया, क्षमा और पवित्र अनुष्ठान की किरण है। इसके बाद, बीसवीं शताब्दी में, संत जरमेन एक बार फिर [[Special:MyLanguage/Great White Brotherhood|श्वेत महासंघ]] (ग्रेट व्हाइट ब्रदरहुड) की एक बाहरी गतिविधि को प्रायोजित करने के लिए आगे बढ़े। | अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, संत जरमेन ने महिला दिव्यगुरु [[Special:MyLanguage/Kuan Yin|कुआन यिन]] (Kuan Yin) से सातवीं किरण चौहान का पद प्राप्त किया। सातवीं किरण दया, क्षमा और पवित्र अनुष्ठान की किरण है। इसके बाद, बीसवीं शताब्दी में, संत जरमेन एक बार फिर [[Special:MyLanguage/Great White Brotherhood|श्वेत महासंघ]] (ग्रेट व्हाइट ब्रदरहुड) की एक बाहरी गतिविधि को प्रायोजित करने के लिए आगे बढ़े। | ||
१९३० के दशक के आरंभ में उन्होंने अपने "पृथ्वी पर कार्यरत सेनापति" (general in the field) जॉर्ज वाशिंगटन (George Washington) से संपर्क किया, और उन्हें एक [[Special:MyLanguage/messenger|संदेशवाहक]] के रूप में प्रशिक्षित किया। वाशिंगटन ने [[Special:MyLanguage/Godfré Ray King|गॉडफ्रे रे किंग]] (गॉडफ्रे रे किंग) के उपनाम से, "अनवील्ड मिस्ट्रीज़" (Unveiled Mysteries), "द मैजिक प्रेज़ेंस" (The Magic Presence)और "द "आई एम" डिस्कोर्सेज़" (The “I AM” Discourses) नामक पुस्तकें लिखीं जिनमें उन्होंने संत | १९३० के दशक के आरंभ में उन्होंने अपने "पृथ्वी पर कार्यरत सेनापति" (general in the field) जॉर्ज वाशिंगटन (George Washington) से संपर्क किया, और उन्हें एक [[Special:MyLanguage/messenger|संदेशवाहक]] के रूप में प्रशिक्षित किया। वाशिंगटन ने [[Special:MyLanguage/Godfré Ray King|गॉडफ्रे रे किंग]] (गॉडफ्रे रे किंग) के उपनाम से, "अनवील्ड मिस्ट्रीज़" (Unveiled Mysteries), "द मैजिक प्रेज़ेंस" (The Magic Presence)और "द "आई एम" डिस्कोर्सेज़" (The “I AM” Discourses) नामक पुस्तकें लिखीं जिनमें उन्होंने संत जरमेन द्वारा नए युग के लिए दिए गए निर्देशों के बारे में लिखा। इसी दशक के अंतिम दिनों में न्याय की देवी पोरशिया (Portia) और अन्य [[Special:MyLanguage/cosmic being|ब्रह्मांडीय प्राणी]] पवित्र अग्नि की शिक्षाओं को मानवजाति तक पहुँचाने और [[Special:MyLanguage/golden age|स्वर्ण युग]] की शुरुआत करने में संत जरमेन की सहायता करने पृथ्वी पर अवतरित हुए। | ||
1961 में संत जरमेन ने पृथ्वी पर अपने प्रतिनिधि, संदेशवाहक [[Special:MyLanguage/Mark L. Prophet|मार्क एल. प्रोफेट]] (Mark L. Prophet) से संपर्क किया और [[Special:MyLanguage/Ancient of Days|आदिकालीन परमेश्वर]] (Ancient of Days)(सनत कुमार) और उनके प्रथम और दूसरे शिष्य [[Special:MyLanguage/Gautama|गौतम]] और [[Special:MyLanguage/Lord Maitreya|मैत्रेय]] (Lord Maitreya) की स्मृति में [[Special:MyLanguage/Keepers of the Flame Fraternity|दिव्य ज्योति के संरक्षकों का संघ]] (Keepers of the Flame Fraternity) की स्थापना की। इनका उद्देश्य उन सभी लोगों को पुनर्जागृत करना था जो मूल रूप से [[Special:MyLanguage/Sanat Kumara|सनत कुमार]] के साथ पृथ्वी पर आए थे। ये लोग पृथ्वी पर शिक्षकों के रूप में आये थे और इनका काम लोगों की सेवा करना था परन्तु यहाँ आकर वे सब ये बातें भूल गए थे। संत जरमेन का कार्य उन सबकी स्मृति को पुनर्स्थापित करना था। | |||
इस प्रकार संत | इस प्रकार संत जरमेन ने मूल लौ रक्षकों को प्राचीन काल के स्वामी (Ancient of Days, Sanat Kumara) की वाणी को ध्यान से सुनने को कहा। उन्होंने इन सभी लोगों को अपनी आत्मा में जीवन की ज्वाला और स्वतंत्रता की पवित्र अग्नि को पुनः प्रज्वलित करने और अपने जीवन को ईश्वर की सेवा में पुनः समर्पित करने के आह्वान दिया। संत जरमेन दिव्य ज्योति-रक्षक बंधुत्व के शूरवीर सेनाध्यक्ष हैं। | ||
<span id="Hierarch_of_the_Aquarian_Age"></span> | <span id="Hierarch_of_the_Aquarian_Age"></span> | ||
== कुम्भ युग के अध्यक्ष == | == कुम्भ युग के अध्यक्ष (Hierarch of the Aquarian Age) == | ||
1 मई 1954 को संत जरमेन ने सनत कुमार से शक्ति का प्रभुत्व और ईसा मसीह से अगले दो हज़ार वर्ष की अवधि के लिए मानवजाति की चेतना को निर्देशित का अधिकार प्राप्त किया। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि ईसा मसीह का महत्व कम हो गया है। वे अब उच्च स्तरों पर [[Special:MyLanguage/World Teacher|विश्व गुरु]] के रूप में काम कर रहे हैं, और अपनी चेतना को समस्त मानवजाति के लिए पहले से भी अधिक शक्तिशाली और सर्वव्यापी रूप से दे रहे हैं क्योंकि ईश्वर का स्वभाव निरंतर श्रेष्ठ होना है। हम एक ऐसे ब्रह्मांड में रहते हैं जिसका निरंतर विस्तार होता रहता है - ब्रह्मांड जो ईश्वर के प्रत्येक पुत्र (सूर्य) के केंद्र से विस्तारित होता है। | |||
इस दो हजार वर्ष की अवधि के दौरान वायलेट लौ का आह्वान कर के हम स्वयं में ईश्वर की ऊर्जा (जिसे हमने हजारों वर्षों की अपनी गलत आदतों द्वारा अपवित्र किया है) को शुद्ध कर सकते हैं। ऐसा करने से समस्त मानवजाति भय, अभाव, पाप, बीमारी और मृत्यु से मुक्त हो सकती है, और सभी मनुष्य स्वतंत्र रूप से प्रकाश में चल सकते हैं। | इस दो हजार वर्ष की अवधि के दौरान वायलेट लौ का आह्वान कर के हम स्वयं में ईश्वर की ऊर्जा (जिसे हमने हजारों वर्षों की अपनी गलत आदतों द्वारा अपवित्र किया है) को शुद्ध कर सकते हैं। ऐसा करने से समस्त मानवजाति भय, अभाव, पाप, बीमारी और मृत्यु से मुक्त हो सकती है, और सभी मनुष्य स्वतंत्र रूप से प्रकाश में चल सकते हैं। | ||
[[Special:MyLanguage/age of Aquarius|कुंभ युग]] की शुरुआत में संत | [[Special:MyLanguage/age of Aquarius|कुंभ युग]] (age of Aquarius) की शुरुआत में संत जरमेन कर्मों के स्वामी के समक्ष गए और उनसे वायलेट लौ को सामान्य इंसानों तक पहुंचाने की आज्ञा मांगी। इसके पहले तक वायलेट लौ का ज्ञान श्वेत महासंघ के आंतरिक आश्रमों और [[Special:MyLanguage/mystery school|रहस्यवाद के विद्यालयों]] में ही था। संत जरमेन हमें वायलेट लौ के आह्वान से होने वाले लाभ के बारे में बताते हैं: | ||
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वायलेट लौ ने पारिवारिक रिश्तों में मदद की है। इसने कुछ लोगों को अपने पुराने कर्मों को संतुलित करने में सहायता की है और वे अपने पुराने दुखों से मुक्त होने लगे हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि वायलेट लौ में ईश्वरीय न्याय की लौ निहित है, और ईश्वरीय न्याय में ईश्वर का मूल्याङ्कन। इसलिए हम ये कह सकते हैं कि वायलेट लौ एक दोधारी [[Special:MyLanguage/sword|तलवार]] के सामान है जो सत्य को असत्य से अलग करती है... | वायलेट लौ ने पारिवारिक रिश्तों में मदद की है। इसने कुछ लोगों को अपने पुराने कर्मों को संतुलित करने में सहायता की है और वे अपने पुराने दुखों से मुक्त होने लगे हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि वायलेट लौ में ईश्वरीय न्याय की लौ निहित है, और ईश्वरीय न्याय में ईश्वर का मूल्याङ्कन। इसलिए हम ये कह सकते हैं कि वायलेट लौ एक दोधारी [[Special:MyLanguage/sword|तलवार]] के सामान है जो सत्य को असत्य से अलग करती है... | ||
वायलेट लौ के अनेकानेक लाभ हैं पर उन सभी को यहाँ गिनाना संभव नहीं, लेकिन यह अवश्य है इसके प्रयोग से मनुष्य के भीतर एक गहन बदलाव होता है। वायलेट लौ हमारे उन सभी मतभेदों और मनोवैज्ञानिक समस्यायों का समाधान करती है जो बचपन से या फिर उसे से भी पहले पिछले जन्मों से चली आ रही हैं और जिन्होंने हमारी चेतना में इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि वे जन्म-जन्मांतर से वहीँ स्थित | वायलेट लौ के अनेकानेक लाभ हैं पर उन सभी को यहाँ गिनाना संभव नहीं, लेकिन यह अवश्य है इसके प्रयोग से मनुष्य के भीतर एक गहन बदलाव होता है। वायलेट लौ हमारे उन सभी मतभेदों और मनोवैज्ञानिक समस्यायों का समाधान करती है जो बचपन से या फिर उसे से भी पहले पिछले जन्मों से चली आ रही हैं और जिन्होंने हमारी चेतना में इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि वे जन्म-जन्मांतर से वहीँ स्थित हैं।“सेंट जरमेन, ‘कीप माई पर्पल हार्ट’,” {{POWref|31|72}} [<ref>Saint Germain, “Keep My Purple Heart,” {{POWref|31|72}}</ref> | ||
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== | == कीमियागिरी (Alchemy) == | ||
{{Main-hi|Alchemy| | {{Main-hi|Alchemy|कीमियागिरी}} | ||
संत | संत जरमेन अपनी पुस्तक Saint Germain On Alchemy में कीमियागिरी (alchemy) का विज्ञान सिखाते हैं। वह [[Special:MyLanguage/Amethyst (gemstone)|एमेथिस्ट (रत्न)]] (Amethyst) कीमियागिरी का कुंभ युग का पत्थर और वायलेट लौ का कुंभ युग के पत्थर का उपयोग करते हैं। स्ट्रॉस के वाल्ट्ज (waltzes of Strauss) ‘में वायलेट लौ का स्पंदन (vibration) है और आपको उनके साथ तालमेल (tune) में आने में सहायता करते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि [[Special:MyLanguage/Franz Liszt|फ्रांज़ लिज़्ट]] (Franz Liszt) के ‘राकोत्ज़ी मार्च’ (Rakoczy March) में उनके हृदय की अग्नि और वायलेट लौ का सूत्र समाहित है।” | ||
<span id="Retreats"></span> | <span id="Retreats"></span> | ||
== आश्रयस्थल == | == आश्रयस्थल == | ||
{{main-hi|Royal Teton Retreat|रॉयल | {{main-hi|Royal Teton Retreat|रॉयल टीटाॅन रिट्रीट}} | ||
{{main-hi|Cave of Symbols|केव ऑफ सिम्बल्स}} | {{main-hi|Cave of Symbols|केव ऑफ सिम्बल्स}} | ||
संत | संत जरमेन सहारा रेगिस्तान के ऊपर स्थित स्वर्णिम [[Special:MyLanguage/etheric city|आकाशीय शहर]] (etheric city) में एक केंद्र बनाए रखते हैं। वह [[Special:MyLanguage/Royal Teton Retreat|रॉयल टीटाॅन आश्रय स्थल]] (Royal Teton Retreat) के साथ-साथ टेबल माउंटेन, व्योमिंग (Table Mountain, Wyoming) स्थित अपने भौतिक/आकाशीय आश्रय स्थल, [[Special:MyLanguage/Cave of Symbols|प्रतीकों की गुफा]] (Cave of Symbols) में भी पढ़ाते हैं। इसके अतिरिक्त वे महान दिव्य निर्देशक (Great Divine Director) के केंद्रों —भारत में [[Special:MyLanguage/Cave of Light|प्रकाश की गुफा]] (Cave of Light) और ट्रांसिल्वेनिया (Transylvania) में [[Special:MyLanguage/Rakoczy Mansion|राकोज़ी हवेली]] (Rakoczy Mansion) में भी कार्य करते हैं, जहाँ वे धर्मगुरु के रूप में विराजमान हैं। हाल ही में उन्होंने दक्षिण अमेरिका में [[Special:MyLanguage/God and Goddess Meru|मेरु देवी और देवता]] (God and Goddess Meru) के आश्रय स्थल में भी अपना केंद्र स्थापित किया है। | ||
उनका इलेक्ट्रॉनिक स्वरुप [[Special:MyLanguage/Maltese cross|माल्टीज़ क्रॉस]] है; उनकी खुशबू, वायलेट फूलों की है। | उनका इलेक्ट्रॉनिक स्वरुप [[Special:MyLanguage/Maltese cross|माल्टीज़ क्रॉस]] है; उनकी खुशबू, वायलेट फूलों की है। | ||
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संत जरमेन सातवीं किरण के चौहान हैं। अपनी समरूप जोड़ी (twin flame) महिला गुरु पोरशिया (Portia) - जिन्हें न्याय की देवी भी कहते हैं - के साथ, वे कुंभ युग (Aquarian age) के आध्यात्मिक अधिपति हैं। संत जरमेन को स्वतंत्रता की ज्योति (freedom’s flame) का महान संरक्षक माना जाता है, जबकि पोरशिया न्याय की ज्योति (flame of justice) की संरक्षिका कहा जाता हैं।
संत जरमेन एक कूटनीतिज्ञ (diplomat) के रूप में जाने जाते हैं। वे सभी लोग जो सातवीं किरण का आह्वान करते हैं उन में वह एक सच्चे राजनीतिज्ञ में पाए जाने वाले सभी ईश्वरीय गुणों जैसे गरिमा, शालीनता, सज्जनता और संतुलन आदि को दर्शाते हैं। वह महान दिव्य निर्देशक (Great Divine Director) द्वारा स्थापित राकोज़ी हाउस (Rakoczy Mansion) के सदस्य हैं। वायलेट लौ आजकल उनके ट्रांसिल्वेनिया (Transylvanian) स्थित भवन में प्रतिष्ठित है।
संत जरमेन नाम लैटिन शब्द सैंक्टस जरमेनस से आया है, जिसका अर्थ है “धर्मात्मा भाई”।
इनका उद्देश्य
प्रत्येक दो हज़ार साल का चक्र सात किरणों में से एक के अंतर्गत आता है। ईसा मसीह छठी किरण के चौहान के रूप में पिछले 2000 वर्षों से युग के धर्मगुरु के पद पर कार्यरत थे। 1 मई, 1954 को संत जरमेन और पोरशिया को आने वाले युग (सातवीं किरण का चक्र) का निर्देशक नियुक्त किया गया। सातवीं किरण कुम्भ राशि की है, तथा स्वतंत्रता और न्याय कुंभ राशि के पुरुष व स्त्री तत्त्व हैं। दया के साथ मिलकर वे इस प्रकाश रुपी उपहार (dispensation) में ईश्वर के अन्य सभी गुणों को दर्शाने का आधार प्रदान करते हैं।
संत जरमेन और पोरशिया लोगों को सातवें युग और सातवीं किरण की एक नई जीवन तरंग, एक नई सभ्यता और एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। सातवीं किरण को वायलेट लौ कहते हैं और स्वतंत्रता, न्याय, दया, रसायन विद्या (alchemy)और पवित्र अनुष्ठान (sacred ritual) इसके गुण हैं।
सातवीं किरण के चौहान (स्वामी) के रूप में, संत जरमेन वायलेट लौ के माध्यम से हमारी जीवआत्माओं को रूपांतरण क्रिया के विज्ञान और अनुष्ठान में दीक्षा देते हैं। रेवेलशन 10:7 (Revelation 10:7 in Bible) में जिनके बारे में भविष्यवाणी की गयी थी ये वही सातवें देवदूत हैं। वह परमेश्वर के रहस्य के बारे में बताने आते हैं,और यही उन्होंने अपने "सेवकों और भविष्यवक्ताओं को बताया है।"
संत जरमेन कहते हैं:
मैं एक दिव्य जीव (ascended being) हूँ, लेकिन हमेशा से मैं ऐसा नहीं था। एक या दो नहीं, बल्कि मैंने पृथ्वी पर कई जन्म लिए हैं, और मैं इस धरती पर वैसे ही घूमता था जैसे आज आप घूम रहे हैं। मेरा नश्वर शरीर भी भौतिक आयाम की सीमाओं में बंधा था। एक जन्म में मैं लेमुरिया (Lemuria) पर था और एक अन्य जन्म में अटलांटिस (Atlantis) पर। मैंने कई सभ्यताओं का विकास और विनाश देखा है। मानवजाति के स्वर्ण युग (golden age) और आदिम काल तक के चक्र काल के समय मैंने चेतना के उतार चढ़ाव को देखा है। मैंने देखा है कि किस तरह अपने गलत चुनावों के कारण मनुष्य ने हज़ारों सालों के वैज्ञानिक विकास और प्राप्त की गयी उस उच्चतम ब्रह्मांडीय चेतना को खो दिया जो आज के युग में सबसे उन्नत धर्म के सदस्यों के पास भी नहीं है।
हाँ, मेरे पास कई विकल्प (choices) थे, और अपने लिए मैंने चुनाव स्वयं किया है। सही चुनाव करके ही पुरुष और स्त्री पदक्रम में अपना स्थान निर्धारित करते हैं। ईश्वर की इच्छानुसार चलने का चुनाव करके हम स्वतंत्र हो जाते हैं, मैं भी जन्म और मृत्यु के चक्र से स्वतंत्र हो गया और फिर इस चक्र के बाहर मुझे एक जीवन मिला। मैंने उस लौ (flame) के द्वारा अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की — उस मूल स्वर (Keynote) के द्वारा, जिसे प्राचीन रसायन वैज्ञानिकों (Alchemy) ने कुंभ युग (Aquarian Cycle) का चिन्ह माना, उस बैंगनी अमृत (Purple Elixir) के द्वारा, जिसे संतजन अपने भीतर धारण करते हैं....
आप नश्वर (mortal) हैं। मैं अमर (immortal) हूँ। हमारे बीच बस इतना ही अंतर है कि मैंने स्वतंत्र होना चुना है, और आपको यह चुनाव करना अभी बाकी है। हम दोनों की क्षमताएँ (potential) एक समान हैं, संसाधन (resources) भी एक समान हैं, और हम दोनों का उस एक (ईश्वर) से जुड़ाव भी समान है। मैंने अपनी ईश्वरीय पहचान बनाने का चुनाव किया है। बहुत समय पहले मेरे अंतर्मन से एक शांत एवं धीमी आवाज़ आयी थी: "ईश्वर की संतानों, अपनी ईश्वरीय पहचान बनाओ"। ऐसा लगा मानों ईश्वर ही कह रहे हों। रात के सन्नाटे में जब मैंने पुकार सुनी तो उत्तर दिया, "अवश्य"। उत्तर में पूरा ब्रह्मांड बोल उठा, "अवश्य" । जब मनुष्य अपनी इच्छा प्राक्जत करता है तो उसके अस्तित्व की असीमित क्षमता दिखती है...
मैं संत जरमेन हूँ, और मैं तुम्हारी आत्मा तथा तुम्हारे हृदय की अग्नियों को कुंभ युग (Aquarian Age) की विजय प्राप्ति के लिए आया हूँ। मैंने तुम्हारी आत्मा की दीक्षा (initiation) का मार्ग और स्वरूप निर्धारित किया है। मैं स्वतंत्रता के पथ पर हूँ। आप भी उस पथ पर अपनी यात्रा आरम्भ कीजिये, आप मुझे वहीँ पाओगे। अगर आप चाहोगे तो मैं आपका गुरु होना स्वीकार करूँगा।[1]
देह धारण (शारीरिक जन्म) (Embodiments)
स्वर्ण युग की सभ्यता के शासक (Ruler of a golden-age civilization)
► मुख्य लेख: सहारा मरुस्थल में स्वर्ण युग
पचास हज़ार साल पहले संत जरमेन उस उपजाऊ क्षेत्र - जहाँ आज सहारा मरुस्थल स्थित है - में स्वर्ण युगीन सभ्यता के शासक थे। एक राजा-सम्राट के रूप में, संत जरमेन प्राचीन ज्ञान और भौतिक वृतों के ज्ञान में निपुण थे। और लोग उन्हें अपनी उभरती हुई दिव्यता (Godhood) के आदर्श के रूप में देखते थे। उनका साम्राज्य सौंदर्य, समरूपता और पूर्णता की अद्वितीय ऊँचाई तक पहुँच गया था।
जब इस सभ्यता के लोग महान ईश्वरीय आत्मा (Great God Self) की व्यापक सृजनात्मक योजना की बजाय इंद्रियों के सुखों में अधिक रुचि लेने लगे, तब एक दिव्य परिषद (cosmic council) ने शासक को अपने साम्राज्य से हट जाने का निर्देश दिया। इसके बाद उनका कर्म ही उनका गुरु बनने वाला था। राजा ने अपने मंत्रियों और जनसेवकों के लिए एक विशाल भोज का आयोजन किया। उनके 576 अतिथियों में से प्रत्येक को एक क्रिस्टल का प्याला दिया गया, जो एक ऐसे अमृत से भरा था जिसे “शुद्ध इलेक्ट्रॉनिक सार” (pure electronic essence) कहा गया।
यह अमृत संत जरमेन द्वारा उन्हें आत्मा की रक्षा के लिए दिया गया एक उपहार था, ताकि जब कुंभ युग (Age of Aquarius) में उस स्वर्ण युग की सभ्यता को फिर से स्थापित करने का अवसर आए, तब वे अपनी “I AM Presence” (ईश्वरीय आत्मिक उपस्थिति) को याद कर सकें और वे सभी लोगों के लिए एक उदाहरण बनें कि जब मनुष्य अपने मन, हृदय और आत्मा को ईश्वर की आत्मा के योग्य निवास स्थान बना लेते हैं, तब ईश्वर वास्तव में अपने लोगों के साथ निवास कर सकता है और करेगा।
भोज के समय एक दिव्य गुरु (cosmic master) प्रकट हुए, जिनके मस्तक पर केवल “Victory” (विजय) शब्द अंकित था। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए लोगों को उस संकट के बारे में चेतावनी दी, जो उन्होंने अपनी आस्था की कमी के कारण स्वयं पर एक बड़ा संकट आमंत्रित कर लिया था। उन्होंने उन्हें उनके महान ईश्वरीय स्रोत (Great God Source) की उपेक्षा करने के लिए आगाह किया और भविष्यवाणी की कि यह साम्राज्य एक आगंतुक राजकुमार के अधीन चला जाएगा, जो राजा की पुत्री से विवाह करने की इच्छा रखता होगा।
सात दिन बाद राजा और उनका परिवार उस सभ्यता के स्वर्णिम ईथरिक (golden-etheric) समकक्ष नगर में चले गए। अगले ही दिन वह राजकुमार आया और बिना किसी विरोध के साम्राज्य पर अधिकार कर लिया।
अटलांटिस पर उच्च पुजारी (High priest on Atlantis)
तेरह हज़ार वर्ष पहले, अटलांटिस (Atlantis) की मुख्य भूमि पर स्थित वायलेट फ्लेम मंदिर (Violet Flame Temple) के महायाजक के रूप में, संत जरमेन अपनी प्रार्थनाओं (invocations) और अपने कारण शरीर (causal body) की शक्ति से अग्नि के एक स्तंभ को बनाए रखते थे — यह वास्तव में बैंगनी गाती हुई ज्वाला (violet singing flame) का एक दिव्य फव्वारा था। यह ज्वाला दूर-दूर से लोगों को आकर्षित करती थी, जो शरीर, मन और आत्मा की हर प्रकार की बंधनकारी अवस्था से मुक्ति पाने के लिए वहाँ आते थे। वे यह मुक्ति अपने स्वयं के प्रयासों द्वारा प्राप्त करते थे — प्रार्थनाएँ अर्पित करके और पवित्र अग्नि के लिए सातवीं किरण (seventh-ray) के अनुष्ठानों का अभ्यास करके।
जो लोग वायलेट लौ के मंदिर (Violet Flame Temple) की वेदी पर सेवा करते थे, उन्हें जैडकीयल (Lord Zadkiel) के आश्रम शुद्धिकरण मंदिर (Temple of Purification) में मेल्कीज़ेडक (Melchizedek) की परम्परा (Order of Melchizedek) के सार्वभौमिक पुरोहितत्व की शिक्षा दी जाती थी। यह मंदिर उस स्थान पर स्थित था जहाँ आज क्यूबा द्वीप है। यह पुरोहित परंपरा पूर्ण धर्म और पूर्ण विज्ञान का संगम मानी जाती थी। यहीं पर संत जरमेन और ईसा मसीह (Jesus) — दोनों को अभिषेक (anointing) प्राप्त हुआ था, जिसके बारे में स्वयं ज़ैडकियल ने कहा था: “तुम सदा के लिए मेल्कीज़ेडक की परंपरा के अनुसार एक पुरोहित हो।”
अटलांटिस के डूबने से पहले, जब नोआह (Noah) अपनी नाव (ark) बना रहे थे और आने वाली जल प्रलय (the great Flood) के बारे में लोगों को चेतावनी दे रहे थे, तब ग्रेट डिवाइन डायरेक्टर (Great Divine Director) ने संत जरमेन और कुछ निष्ठावान पुरोहितों को शुद्धिकरण मंदिर (Temple of Purification) से स्वतंत्रता की ज्योति (flame of freedom) को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए बुलाया। वे इस ज्योति को ट्रांसिल्वेनिया के कार्पेथियन (Carpathian foothills in Transylvania) पर्वतों की तराइयों (Carpathian foothills) में ले गए। वहाँ उन्होंने स्वतंत्रता की अग्नियों को विस्तार देने वाले पवित्र अनुष्ठानों को जारी रखा, जबकि ईश्वरीय आदेश के अनुसार मानवजाति को अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ रहा था।
आने वाले अपने सभी जन्मों में महान दिव्य निर्देशक (Great Divine Director) के मार्गदर्शन में संत जरमेन और उनके अनुयायियों ने वायलेट लौ को पुनः प्राप्त किया और मंदिर की रक्षा भी की। इसके बाद महान दिव्य निर्देशक ने अपने शिष्य, संत जरमेन के साथ मिलकर वायलेट लौ के स्थान पर एक आश्रय स्थल स्थापित किया और हंगरी के राजघराने राकोज़ी (House of Rakoczy, the royal house of Hungary) की स्थापना भी की।
ईश्वर के दूत सेमुएल (The Prophet Samuel)

ग्यारहवीं शताब्दी बी सी में, संत जरमेन ने भविष्यवक्ता सैमुएल के रूप में जन्म लिया। वह महान धर्मत्याग (apostasy) के समय के एक असाधारण धार्मिक नेता थे और उन्होंने इजराइल के अंतिम न्यायाधीश तथा उसके प्रथम भविष्यवक्ता के रूप में सेवा की। उन दिनों न्यायाधीश केवल विवादों का निपटारा करने वाले व्यक्ति नहीं होते थे; वे करिश्माई नेता माने जाते थे, जिनके बारे में विश्वास था कि उनका ईश्वर से सीधा संपर्क है और वे इजराइल की जातियों को अत्याचारियों के विरुद्ध एकजुट कर सकते हैं।
सैमुएल ईश्वर द्वारा अब्राहम (Abraham) की संतानों को भ्रष्ट याजकों—एली के पुत्रों—और पलिश्तियों (Philistines) की दासता से मुक्त कराने के सन्देश वाहक थे। पलिश्तियों ने युद्ध में इजराइलियों का भारी संहार किया था। परंपरागत रूप से सैमुएल का नाम Moses के साथ एक महान मध्यस्थ (intercessor) के रूप में लिया जाता है। जब राष्ट्र लगातार पलिश्तियों (Philistines) के खतरों का सामना कर रहा था, तब सैमुएल ने साहसपूर्वक लोगों का आध्यात्मिक पुनर्जागरण में नेतृत्व किया। उन्होंने उन्हें यह कहते हुए प्रेरित किया कि वे “अपने पूरे हृदय से प्रभु की ओर लौटें” और “विदेशी देवताओं को दूर कर दें।” लोगों ने पश्चात्ताप किया और सैमुएल से विनती की कि वे उनकी रक्षा और उद्धार के लिए प्रभु से प्रार्थना करना बंद न करें। जब सैमुएल प्रार्थना कर रहे थे और बलिदान अर्पित कर रहे थे, तब एक भयंकर गर्जन-तूफ़ान उठा, जिससे इजराइलियों को अपने शत्रुओं पर विजय पाने का अवसर मिला। सैमुएल के जीवनकाल में पलिश्ती फिर कभी शक्तिशाली होकर नहीं उठ सके।
सैमुअल ने अपना बाकी जीवन पूरे देश में न्याय करते हुए बिताया। वृद्ध हो जाने पर उन्होंने अपने पुत्रों को इजराइल के न्यायाधीश नियुक्त कर दिया परन्तु उनके पुत्र भ्रष्ट निकले। लोगों ने माँग की कि सैमुअल उन्हें एक राजा दे, जैसा कि अन्य देशों में था। इस बात से बहुत दुःखी होकर [2] ने ईश्वर से प्रार्थना की। फलस्वरूप ईश्वर ने उन्हें निर्देश दिया कि वे लोगों के आदेश का पालन करें। ईश्वर ने कहा, “लोगों ने तुम्हें नहीं, वरन मुझे अस्वीकार किया है, कि मैं उन पर राज्य न करूँ।”[3]
सैमुअल ने इजराइलियों को समझाया कि राजा का शासन होने के बाद उन्हें कई खतरों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन लोग फिर भी राजा की माँग पर अटल रहे। इसके पश्चात सैमुअल ने सॉल (Saul) को उनका नेता नियुक्त किया; उन्होंने उसे तथा लोगों को सदैव ईश्वर के रास्ते पर चलने का निर्देश भी दिया। पर सॉल (Saul) एक विश्वासघाती सेवक साबित हुआ इसलिए सैमुअल ने उसे दंड दिया और गुप्त रूप से राजा डेविड को राजा नियुक्त किया। सैमुअल की मृत्यु के बाद उन्हें रामाह (Ramah) में दफनाया गया। पूरे इजराइल ने उनके निधन का शोक मनाया।
संत जोसेफ (Saint Joseph)
► मुख्य लेख: संत जोसेफ
संत जरमेन एक जन्म में संत जोसेफ थे। वे ईसा मसीह के पिता और मेरी के पति थे। न्यू टेस्टामेंट (New Testament) में उनके बारे में कुछ उल्लेख मिलते हैं। बाइबल में उन्हें राजा डेविड का वशंज बताया गया है। बाइबल में इस बात का भी वर्णन है कि जब एक देवदूत ने उन्हें स्वप्न में चेतावनी दी कि हेरोड (Herod) ईसा मसीह को मारने की योजना बना रहा है, तो जोसेफ अपने परिवार-सहित वह स्थान छोड़ मिस्र चले गए। हेरोड की मृत्यु के बाद ही वे वापस लौटे। ऐसी मान्यता है कि जोसेफ एक बढ़ई थे और ईसा मसीह के सार्वजनिक उपदेश कार्य शुरू करने से पहले ही उनका निधन हो गया था। कैथोलिक परंपरा (Catholic tradition) में संत जोसेफ को विश्वव्यापी चर्च (Universal Church) के संरक्षक (Patron ) के रूप में सम्मानित किया जाता है, और उनका पर्व १९ मार्च को मनाया जाता है।

संत एल्बन (Saint Alban)
तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में, संत जरमेन ने (संत एल्बन) Saint Alban के रूप में अवतार लिया, जिन्हें ब्रिटेन का प्रथम शहीद माना जाता है। एल्बन इंग्लैंड (Alban, England) में उस समय रहते थे जब रोमन सम्राट डायोक्लेटियन (Roman emperor Diocletian) के शासनकाल में ईसाइयों पर अत्याचार हो रहे थे। वे एक मूर्तिपूजक थे। उन्होंने रोमन सेना में सेवा भी की थी और बाद में वेरुलामियम (Verulamium) नामक शहर में बस गए थे। वेरुलामियम शहर का नाम बाद में बदलकर सेंट एल्बंस (St. Albans) कर दिया गया। एल्बन ने एम्फीबालस (Amphibalus) नामक एक भगोड़े/फ़रार (Fugitive) ईसाई पादरी को छुपाया था, जिसने उनका धर्म परिवर्तन करवाया था। जब सैनिक उसे ढूँढ़ने आए तो एल्बन ने पादरी को वहां से भगा दिया और स्वयं पादरी का वेश धारण कर लिया।
जब संत एल्बन का यह कार्य प्रकट हो गया, तब उन्हें कोड़े लगाए गए और मृत्यु-दंड सुनाया गया। कथा के अनुसार, उनके दंड को देखने के लिए इतनी विशाल भीड़ एकत्र हो गई कि लोग उस संकरे पुल से पार नहीं जा पा रहे थे, जिसे पार करना आवश्यक था। संत एल्बन ने प्रार्थना की, और कहा जाता है कि नदी का जल अलग हो गया, जिससे भीड़ को मार्ग मिल गया। यह चमत्कार देखकर उनका नियुक्त जल्लाद प्रभावित होकर ईसाई बन गया और उसने संत एल्बन के स्थान पर स्वयं मरने की प्रार्थना की। किन्तु उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की गई, और अंततः उसका भी एल्बन के साथ सिर काट दिया गया।
संत एल्बन (Saint Alban) को सन् 303 ईस्वी में उनकी मृत्यु के बाद से ही ब्रिटिश द्वीपों (the Isles) के लोगों द्वारा श्रद्धा और सम्मान के साथ पूजनीय माना जाता रहा है। रेवरेंड (Reverend) Alban Butler ने अपनी पुस्तक Lives of the Fathers, Martyrs and other Principal Saints में लिखा है: “हमारे द्वीप ने अनेक युगों तक संत एल्बन को अपने गौरवशाली प्रथम शहीद (protomartyr) और ईश्वर के समक्ष शक्तिशाली संरक्षक के रूप में पहचाना और उनकी मध्यस्थता के द्वारा ईश्वर से प्राप्त अनेक महान कृपाओं को स्वीकार किया।” यह कथन दर्शाता है कि संत एल्बन को ब्रिटेन में केवल एक शहीद ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रक्षक और प्रेरणास्रोत के रूप में भी देखा जाता था।
प्रोक्लस के शिक्षक (Teacher of Proclus)
संत जरमेन ने आंतरिक लोकों (planes) से कार्य करते हुए नियोप्लेटोनिस्टों (Neoplatonists) के लिए एक महागुरु (Master Teacher) के रूप में मार्गदर्शन दिया। उन्होंने यूनानी दार्शनिक प्रोक्लस (Proclus) (लगभग 410–485 ईस्वी), जो एथेंस में प्लेटो की अकादमी (Plato’s Academy at Athens) के अत्यंत सम्मानित प्रमुख थे, को प्रेरित किया। उन्होंने अपने शिष्य के पूर्वजन्म को एक पाइथागोरसी दार्शनिक (Pythagorean philosopher) के रूप में प्रकट किया और साथ ही प्रोक्लस को कॉन्स्टैन्टाइन (Constantine) के ईसाई धर्म की कथित दिखावटी प्रकृति तथा व्यक्तिवाद के मार्ग के महत्व से अवगत कराया। यह मार्ग व्यक्ति के भीतर स्थित ईश्वरीय ज्योति (God flame) के पूर्ण विकास और व्यक्तिवाद (individualism) की ओर ले जाता है, जिसे उस समय के ईसाई 'पैगनवाद' (मूर्तिपूजक या गैर-ईसाई परंपरा) कहते थे।"
अपने गुरु संत संत जरमेन के मार्गदर्शन में प्रोक्लस (Proclus) ने अपने दर्शनशास्त्र को इस सिद्धांत पर आधारित किया कि सत्य केवल एक ही है और वह है कि "ईश्वर एक है"। ईश्वर को पाना ही इस जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। उन्होंने कहा, "सभी शरीरों से परे आत्मा है, सभी आत्माओं से परे बौद्धिक अस्तित्व, और सभी बौद्धिक अस्तित्वों से परे एक (ईश्वर) है।"Cite error: Closing </ref> missing for <ref> tag]
मर्लिन (Merlin)
► मुख्य लेख: मर्लिन
पाँचवीं शताब्दी में संत जरमेन मर्लिन (Merlin) के रूप में अवतरित हुए। वह राजा आर्थर (King Arthur) के दरबार में एक रसायनशास्त्री थे, भविष्यवक्ता और सलाहकार के रूप में कार्य करते थे। युद्धरत सामंतों (warring chieftains) से विखंडित (splintered) और सैक्सन आक्रमणकारियों (Saxon invaders) से त्रस्त भूमि में मर्लिन ने ब्रिटेन के राज्य को एकजुट करने के लिए बारह युद्धों (जो वास्तव में बारह दीक्षाएँ थीं) में आर्थर का नेतृत्व किया। उन्होंने राउंड टेबल (Round Table) की पवित्र अध्येतावृत्ति स्थापित करने के लिए राजा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। मर्लिन और आर्थर के मार्गदर्शन में कैमलॉट (Camelot) रहस्य का विद्यालय (mystery school) था जहाँ वीर पुरुष और स्त्रियां (knights and ladies) होली ग्रेल (Holy Grail) के रहस्यों को जानने के लिए अध्ययन करते थे, और स्वयं का आध्यात्मिक विकास भी करते थे।
कुछ परंपराओं में मर्लिन को एक ईश्वरीय ऋषि के रूप में वर्णित किया गया है जिन्होंने तारों का अध्ययन किया और जिनकी भविष्यवाणियाँ सत्तर सचिवों (seventy secretaries) द्वारा दर्ज की गईं। "द प्रोफेसीस ऑफ मर्लिन" (The Prophecies of Merlin), जो आर्थर के समय से लेकर सुदूर भविष्य तक की घटनाओं का वर्णन करती है, मध्य युग में अत्यंत लोकप्रिय थी।

रोजर बेकन (Roger Bacon)
► मुख्य लेख: रोजर बेकन
संत जरमेन एक जन्म में रोजर बेकन (Roger Bacon) (1220–1292) थे। बेकन के रूप में वह एक दार्शनिक, फ्रांसिस्कन भिक्षु, शिक्षाविद्, शैक्षिक सुधारक और प्रयोगात्मक वैज्ञानिक थे। वह एक ऐसा युग था जब विज्ञान का मापदंड धर्म और तर्क पर आधारित था, और ऐसे समय में बेकन ने विज्ञान में प्रयोगात्मक पद्धति को बढ़ावा दिया; उन्होंने कहा कि दुनिया गोल है - उन्होंने उस समय के विद्वानों और वैज्ञानिकों की संकीर्ण विचारधारा की निंदा की। उन्होंने कहा कि "सच्चा ज्ञान दूसरों के अधिकार से नहीं उत्पन्न होता और ना ही यह पुरातनपंथी सिद्धांतों (blind allegiance) के प्रति अंधश्रद्धा (antiquated dogmas) से उपजता है।" [4][5] अंततः बेकन ने पेरिस विश्वविद्यालय में व्याख्याता का पद छोड़ दिया और फ्रांसिस्कन ऑर्डर ऑफ़ फ्रायर्स माइनर (Franciscan Order of Friars Minor) में शामिल हो गए।
बेकन रसायन विद्या, प्रकाशविज्ञान, गणित और विभिन्न भाषाओं पर अपने गहन शोध के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें आधुनिक विज्ञान का अग्रदूत और आधुनिक तकनीक का भविष्यवक्ता माना जाता है। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि आने वाले समय में गर्म हवा के गुब्बारे, उड़ने वाली मशीन, चश्मे, दूरबीन, सूक्ष्मदशंक यंत्र, लिफ्ट और यंत्रचालित जहाज़ और गाड़ियां होंगी - उन्होंने इन सब के बारे में ऐसे लिखा मानो ये उनका प्रत्यक्ष अनुभव हो।
उनके वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण, धर्मशास्त्रियों पर उनके आक्षेपों और रसायन विद्या तथा ज्योतिष शास्त्र के उनके ज्ञान के कारण उन पर "विधर्मी और असमान्य" (“heresies and novelties”) होने के आरोप लगे। इन सब बातों के लिए उनके साथी फ्रांसिस्कन (Franciscans) लोगों ने उन्हें चौदह साल के लिए कारावास में डाल दिया। लेकिन अपने अनुयायियों के लिए बेकन "डॉक्टर मिराबिलिस" (“doctor mirabilis”) ("अद्भुत शिक्षक") थे - यह एक ऐसी उपाधि है जिससे उन्हें सदियों से जाना जाता रहा है।

क्रिस्टोफर कोलंबस (Christopher Columbus)
► मुख्य लेख: क्रिस्टोफर कोलंबस
एक अन्य जन्म में संत जरमेन अमेरिका के आविष्कारक क्रिस्टोफर कोलंबस (Christopher Columbus) (१४५१-१५०६) थे। कोलंबस के जन्म से दो शताब्दी से भी अधिक समय पहले रोजर बेकन ( Roger Bacon) कोलंबस की यात्रा के लिए मंच तैयार किया था - उन्होंने अपनी पुस्तक ओपस माजस (Opus Majus) में लिखा था कि "यदि मौसम अनुकूल हो तो पश्चिम में स्पेन के अंत और पूर्व में भारत की शुरुआत के बीच का समुद्र की यात्रा कुछ ही दिनों की जा सकती है।" [6] [David Wallechinsky, Amy Wallace and Irving Wallace, The Book of Predictions (New York: William Morrow and Co., 1980), p. 346.] "हालाँकि यह कथन गलत था कि स्पेन के पश्चिम में स्थित भूमि भारत थी, फिर भी यह कोलंबस की खोज में सहायक साबित हुआ। उन्होंने इस अंश को 1498 में राजा फर्डिनेंड और रानी इसाबेला को लिखे एक पत्र में उद्धृत किया और कहा कि उनकी 1492 की यात्रा आंशिक रूप से इसी दूरदर्शी कथन से प्रेरित थी।"
कोलंबस का मानना था कि ईश्वर ने उन्हें "नए स्वर्ग और नई पृथ्वी का संदेशवाहक बनाया था, जिसके बारे में उन्होंने अपोकलीप्स ऑफ़ सेंट जॉन (Apocalypse of St. John), में लिखा था, आईज़ेयाह (Isaiah) ने भी इसके बारे में कहा था। "इंडीज के इस उद्यम को अंजाम देने में, (“In the carrying out of this enterprise of the Indies)“क्लेमेंट्स आर. मार्कहैम द्वारा लिखित पुस्तक Life of Christopher Columbus (लंदन: जॉर्ज फिलिप एंड सन, 1892), पृष्ठ 207–208।” [[7]] उन्होंने 1502 में राजा फर्डिनेंड और रानी इसाबेला को लिखा, "आईज़ेयाह पूरी तरह से सही कहा था - तर्क, गणित, या नक्शे मेरे किसी काम के नहीं थे।" कोलंबस आईज़ेयाह (Isaiah) की 11:10–12 में दर्ज भविष्यवाणी का उल्लेख कर रहे थे कि प्रभु “अपनी प्रजा के बचे हुओं को बचा लेंगे... और इजराइल के निकाले हुओं को इकट्ठा करेंगे, और पृथ्वी की चारों दिशाओं से जुडाह के बिखरे हुओं को इकट्ठा करेंगे।” “एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका (15वाँ संस्करण), विषय प्रविष्टि: ‘क्रिस्टोफर कोलंबस’।” [[8]]
उन्हें पूरा विश्वास था कि ईश्वर ने ही उन्हें इस मिशन के लिए चुना है। उन्होंने बाइबल में लिखी भविष्यवाणियों को पढ़ा और अपने मिशन से संबंधित बातों को अपनी एक पुस्तक में लिखा, जिसका शीर्षक था Las Profecías (या The Prophecies)—इसके पूर्ण रूप में इसका नाम था The Book of Prophecies concerning the Discovery of the Indies and the Recovery of Jerusalem (इंडीज़ की खोज और यरूशलम की पुनः प्राप्ति से संबंधित भविष्यवाणियों की पुस्तक)। हालाँकि इस बात पर कम ही ज़ोर दिया जाता है, लेकिन यह एक माना हुआ तथ्य है तथा इसके बारे में "एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका" (Encyclopaedia Britannica) में भी स्पष्ट रूप से लिखा है कि "कोलंबस ने खगोल विज्ञान नहीं वरन भविष्यवाणी का अनुसरण कर अमरीका की खोज की थी।"

फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon)
► मुख्य लेख: फ्रांसिस बेकन
फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) (1561–1626) एक दार्शनिक, राजनेता, निबंधकार और साहित्यकार थे। बेकन को पश्चिम का अब तक का सबसे बड़ा ज्ञानी और विचारक (greatest mind the West ever produced) कहा जाता है। वह आगमनात्मक तर्क और वैज्ञानिक पद्धति (father of inductive reasoning and the scientific method) के जनक माने जाते हैं। वह काफी हद तक इस तकनीकी युग के लिए ज़िम्मेदार हैं जिसमें हम आज जी रहे हैं। वह जानते थे कि केवल व्यावहारिक विज्ञान ही जनसाधारण को मानवीय कष्टों और मानव जीवन की नीरसता से मुक्ति दिला सकता है और ऐसा होने पर ही मनुष्य आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो सकता है, व् उस उत्तम आध्यात्मिकता की पुनः खोज कर सकता है जिसे वह पहले कभी अच्छी तरह से जानता था।
"महान असंतृप्ति" (“The Great Instauration”) (अर्थात पतन, नाश , गलतियों, और जीर्णावस्था के बाद वृहद् पुनर्स्थापना) "संपूर्ण विश्व" को बदलने का उनका तरीका था। इस बात की अवधारणा पहली बार उन्होंने बचपन में की थी। फिर १६०७, में उन्होंने इसी नाम से अपनी पुस्तक में इसे मूर्त रूप दिया। इसके बाद अंग्रेजी पुनर्जागरण (Renaissance) की शुरुआत की।
समय के साथ-साथ बेकन ने अपने आसपास कुछ ऐसे लेखकों को एकत्र किया जो एलिज़ाबेथकालीन साहित्य (Elizabethan literature) के लिए ज़िम्मेदार थे। इनमें से कुछ एक "गुप्त संस्था" (secret society) - "द नाइट्स ऑफ़ द हेलमेट" (The Knights of the Helmet) के सदस्य थे। इस संस्था का लक्ष्य अंग्रेजी भाषा का विस्तार करना था और एक ऐसे नए साहित्य की रचना करना था जिसे अंग्रेज लोग समझ पाएं। बेकन ने बाइबल के अनुवाद (किंग जेम्स का संस्करण) का भी आयोजन किया - उनका यह दृढ़ निश्चय था कि साधारण लोगों को भी ईश्वर के कहे शब्दों को पढ़ने का मौका मिलना चाहिए।
1890 के दशक में शेक्सपियर के नाटकों के मूल मुद्रणों (original printings) और बेकन तथा अन्य एलिज़ाबेथ काल के लेखकों की कृतियों में लिखे सांकेतिक शब्दों से यह आभास होता है कि बेकन ने शेक्सपियर के नाटक लिखे थे और वह महारानी एलिजाबेथ और लॉर्ड लीसेस्टर (Queen Elizabeth and Lord Leicester) के पुत्र थे।[9] हालाँकि उनकी माँ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया क्योंकि वह डरती थीं की सत्ता उचित समय से पहले भी उनके हाथ से निकल सकती है।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और उनकी बहुमुखी प्रतिभाओं को उचित पहचान नहीं मिली। कहा जाता है कि उनका निधन 1626 में हुआ, किंतु कुछ लोगों का दावा है कि इसके बाद भी वे कुछ समय तक गुप्त रूप से यूरोप में जीवित रहे। ऐसी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करते हुए, जो साधारण व्यक्तियों को नष्ट कर सकती थीं, उनकी आत्मा ने 1 मई 1684 को राकोज़ी मेंशन (Rakoczy Mansion) से, जो महान दिव्य निर्देशक (Great Divine Director) का निवास-स्थल माना जाता है, तथाकथित आरोहण (Ascension) के अनुष्ठान में प्रवेश किया।


यूरोप का अजूबा आदमी (The Wonderman of Europe)
► मुख्य लेख: यूरोप का अजूबा आदमी
लोगों को मुक्ति दिलाने की सर्वोपरि इच्छा रखते हुए संत जरमेन ने कर्म के स्वामी (Lords of Karma) से भौतिक शरीर में पृथ्वी पर लौटने की अनुमति मांगी और उन्हें यह अनुमति मिल भी गई। वह "ले कॉम्टे डे सेंट जरमेन" (le Comte de Saint Germain) के रूप में प्रकट हुए - "अलौकिक गुणों वाला सज्जन व्यक्ति" जिन्होंने अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के समय यूरोप के दरबारों को चकित कर दिया था। यहीं से उन्हें "द वंडरमैन (अद्भुत व्यक्ति)" का खिताब मिला।
वे एक आद्यवैज्ञानिक, विद्वान, भाषाविद्, कवि, संगीतकार, कलाकार, कथाकार और राजनयिक थे। यूरोप के दरबारों में उनकी काफी प्रशंसा की जाती थी। उन्हें मणियों की पहचान थी, उन्हें हीरे और अन्य रत्नों में दोष निकालने के लिए जाना जाता था। साथ ही उन्हें एक हाथ से पत्र और दूसरे हाथ से कविता लिखने जैसे कार्य के लिए भी जाना जाता था। वोल्टेयर के शब्दों में "वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो कभी नहीं मर सकता, और जो सब कुछ जानता है।"[12] उनका उल्लेख फ्रेडरिक द ग्रेट (Frederick the Great), वोल्टेयर (Voltaire), होरेस वालपोल (Horace Walpole) और कैसानोवा (Casanova) के पत्रों और उस समय के समाचार पत्रों में मिलता है।
परदे के पीछे से संत जरमेन यह प्रयास कर रहे थे कि फ्रांसीसी क्रांति (फ्रांसीसी क्रांति) बिना रक्तपात के हो जाए - राजतंत्र को प्रजातंत्र में आराम से बदल दिया जाए ताकि जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार हो। लेकिन उनकी इस सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यूरोप को एकजुट करने के अपने अंतिम प्रयास में उन्होंने नेपोलियन (Napoleon) का समर्थन किया, परन्तु नेपोलियन ने अपने गुरु की शक्तियों का दुरुपयोग किया और मृत्यु को प्राप्त किया।
लेकिन इससे भी पहले संत जरमेन ने अपना ध्यान एक नई दुनिया की ओर मोड़ लिया था। वे संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of America) और उसके प्रथम राष्ट्रपति (George Washington) के प्रायोजक बने। स्वतंत्रता की घोषणा और संविधान उन्हीं से प्रेरित था। उन्होंने कई ऐसे उपकरणों को बनाने की प्रेरणा भी दी जिनसे शारीरिक श्रम का कम से कम उपयोग हो ताकि मानवजाति कठिन परिश्रम से मुक्त होकर ईश्वर-प्राप्ति के रास्ते पर चल सके।
सातवीं किरण के चौहान Chohan of the Seventh Ray)
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, संत जरमेन ने महिला दिव्यगुरु कुआन यिन (Kuan Yin) से सातवीं किरण चौहान का पद प्राप्त किया। सातवीं किरण दया, क्षमा और पवित्र अनुष्ठान की किरण है। इसके बाद, बीसवीं शताब्दी में, संत जरमेन एक बार फिर श्वेत महासंघ (ग्रेट व्हाइट ब्रदरहुड) की एक बाहरी गतिविधि को प्रायोजित करने के लिए आगे बढ़े।
१९३० के दशक के आरंभ में उन्होंने अपने "पृथ्वी पर कार्यरत सेनापति" (general in the field) जॉर्ज वाशिंगटन (George Washington) से संपर्क किया, और उन्हें एक संदेशवाहक के रूप में प्रशिक्षित किया। वाशिंगटन ने गॉडफ्रे रे किंग (गॉडफ्रे रे किंग) के उपनाम से, "अनवील्ड मिस्ट्रीज़" (Unveiled Mysteries), "द मैजिक प्रेज़ेंस" (The Magic Presence)और "द "आई एम" डिस्कोर्सेज़" (The “I AM” Discourses) नामक पुस्तकें लिखीं जिनमें उन्होंने संत जरमेन द्वारा नए युग के लिए दिए गए निर्देशों के बारे में लिखा। इसी दशक के अंतिम दिनों में न्याय की देवी पोरशिया (Portia) और अन्य ब्रह्मांडीय प्राणी पवित्र अग्नि की शिक्षाओं को मानवजाति तक पहुँचाने और स्वर्ण युग की शुरुआत करने में संत जरमेन की सहायता करने पृथ्वी पर अवतरित हुए।
1961 में संत जरमेन ने पृथ्वी पर अपने प्रतिनिधि, संदेशवाहक मार्क एल. प्रोफेट (Mark L. Prophet) से संपर्क किया और आदिकालीन परमेश्वर (Ancient of Days)(सनत कुमार) और उनके प्रथम और दूसरे शिष्य गौतम और मैत्रेय (Lord Maitreya) की स्मृति में दिव्य ज्योति के संरक्षकों का संघ (Keepers of the Flame Fraternity) की स्थापना की। इनका उद्देश्य उन सभी लोगों को पुनर्जागृत करना था जो मूल रूप से सनत कुमार के साथ पृथ्वी पर आए थे। ये लोग पृथ्वी पर शिक्षकों के रूप में आये थे और इनका काम लोगों की सेवा करना था परन्तु यहाँ आकर वे सब ये बातें भूल गए थे। संत जरमेन का कार्य उन सबकी स्मृति को पुनर्स्थापित करना था।
इस प्रकार संत जरमेन ने मूल लौ रक्षकों को प्राचीन काल के स्वामी (Ancient of Days, Sanat Kumara) की वाणी को ध्यान से सुनने को कहा। उन्होंने इन सभी लोगों को अपनी आत्मा में जीवन की ज्वाला और स्वतंत्रता की पवित्र अग्नि को पुनः प्रज्वलित करने और अपने जीवन को ईश्वर की सेवा में पुनः समर्पित करने के आह्वान दिया। संत जरमेन दिव्य ज्योति-रक्षक बंधुत्व के शूरवीर सेनाध्यक्ष हैं।
कुम्भ युग के अध्यक्ष (Hierarch of the Aquarian Age)
1 मई 1954 को संत जरमेन ने सनत कुमार से शक्ति का प्रभुत्व और ईसा मसीह से अगले दो हज़ार वर्ष की अवधि के लिए मानवजाति की चेतना को निर्देशित का अधिकार प्राप्त किया। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि ईसा मसीह का महत्व कम हो गया है। वे अब उच्च स्तरों पर विश्व गुरु के रूप में काम कर रहे हैं, और अपनी चेतना को समस्त मानवजाति के लिए पहले से भी अधिक शक्तिशाली और सर्वव्यापी रूप से दे रहे हैं क्योंकि ईश्वर का स्वभाव निरंतर श्रेष्ठ होना है। हम एक ऐसे ब्रह्मांड में रहते हैं जिसका निरंतर विस्तार होता रहता है - ब्रह्मांड जो ईश्वर के प्रत्येक पुत्र (सूर्य) के केंद्र से विस्तारित होता है।
इस दो हजार वर्ष की अवधि के दौरान वायलेट लौ का आह्वान कर के हम स्वयं में ईश्वर की ऊर्जा (जिसे हमने हजारों वर्षों की अपनी गलत आदतों द्वारा अपवित्र किया है) को शुद्ध कर सकते हैं। ऐसा करने से समस्त मानवजाति भय, अभाव, पाप, बीमारी और मृत्यु से मुक्त हो सकती है, और सभी मनुष्य स्वतंत्र रूप से प्रकाश में चल सकते हैं।
कुंभ युग (age of Aquarius) की शुरुआत में संत जरमेन कर्मों के स्वामी के समक्ष गए और उनसे वायलेट लौ को सामान्य इंसानों तक पहुंचाने की आज्ञा मांगी। इसके पहले तक वायलेट लौ का ज्ञान श्वेत महासंघ के आंतरिक आश्रमों और रहस्यवाद के विद्यालयों में ही था। संत जरमेन हमें वायलेट लौ के आह्वान से होने वाले लाभ के बारे में बताते हैं:
आपमें से कुछ लोगों के अधिकतर कर्म संतुलित हो गए हैं, कुछ के हृदय चक्र निर्मल हो गए हैं। जीवन में एक नया प्रेम, नई कोमलता, नई करुणा, जीवन के प्रति एक नई संवेदनशीलता, एक नई स्वतंत्रता और उस स्वतंत्रता की खोज में एक नया आनंद आ गया है। एक नई पवित्रता का उदय भी हुआ है क्योंकि मेरी लौ के माध्यम से आपका मेलकिडेक समुदाय के पुरोहितत्व से संपर्क हुआ है। अज्ञानता और मानसिक जड़ता कुछ सीमा तक समाप्त हुई है, और लोग एक ऐसे रास्ते पर चल पड़े हैं जो उन्हें ईश्वर तक पहुंचाता है।
वायलेट लौ ने पारिवारिक रिश्तों में मदद की है। इसने कुछ लोगों को अपने पुराने कर्मों को संतुलित करने में सहायता की है और वे अपने पुराने दुखों से मुक्त होने लगे हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि वायलेट लौ में ईश्वरीय न्याय की लौ निहित है, और ईश्वरीय न्याय में ईश्वर का मूल्याङ्कन। इसलिए हम ये कह सकते हैं कि वायलेट लौ एक दोधारी तलवार के सामान है जो सत्य को असत्य से अलग करती है...
वायलेट लौ के अनेकानेक लाभ हैं पर उन सभी को यहाँ गिनाना संभव नहीं, लेकिन यह अवश्य है इसके प्रयोग से मनुष्य के भीतर एक गहन बदलाव होता है। वायलेट लौ हमारे उन सभी मतभेदों और मनोवैज्ञानिक समस्यायों का समाधान करती है जो बचपन से या फिर उसे से भी पहले पिछले जन्मों से चली आ रही हैं और जिन्होंने हमारी चेतना में इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं कि वे जन्म-जन्मांतर से वहीँ स्थित हैं।“सेंट जरमेन, ‘कीप माई पर्पल हार्ट’,” Pearls of Wisdom, vol. 31, no. 72. [[13]
]
कीमियागिरी (Alchemy)
► मुख्य लेख: कीमियागिरी
संत जरमेन अपनी पुस्तक Saint Germain On Alchemy में कीमियागिरी (alchemy) का विज्ञान सिखाते हैं। वह एमेथिस्ट (रत्न) (Amethyst) कीमियागिरी का कुंभ युग का पत्थर और वायलेट लौ का कुंभ युग के पत्थर का उपयोग करते हैं। स्ट्रॉस के वाल्ट्ज (waltzes of Strauss) ‘में वायलेट लौ का स्पंदन (vibration) है और आपको उनके साथ तालमेल (tune) में आने में सहायता करते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि फ्रांज़ लिज़्ट (Franz Liszt) के ‘राकोत्ज़ी मार्च’ (Rakoczy March) में उनके हृदय की अग्नि और वायलेट लौ का सूत्र समाहित है।”
आश्रयस्थल
► मुख्य लेख: रॉयल टीटाॅन रिट्रीट
► मुख्य लेख: केव ऑफ सिम्बल्स
संत जरमेन सहारा रेगिस्तान के ऊपर स्थित स्वर्णिम आकाशीय शहर (etheric city) में एक केंद्र बनाए रखते हैं। वह रॉयल टीटाॅन आश्रय स्थल (Royal Teton Retreat) के साथ-साथ टेबल माउंटेन, व्योमिंग (Table Mountain, Wyoming) स्थित अपने भौतिक/आकाशीय आश्रय स्थल, प्रतीकों की गुफा (Cave of Symbols) में भी पढ़ाते हैं। इसके अतिरिक्त वे महान दिव्य निर्देशक (Great Divine Director) के केंद्रों —भारत में प्रकाश की गुफा (Cave of Light) और ट्रांसिल्वेनिया (Transylvania) में राकोज़ी हवेली (Rakoczy Mansion) में भी कार्य करते हैं, जहाँ वे धर्मगुरु के रूप में विराजमान हैं। हाल ही में उन्होंने दक्षिण अमेरिका में मेरु देवी और देवता (God and Goddess Meru) के आश्रय स्थल में भी अपना केंद्र स्थापित किया है।
उनका इलेक्ट्रॉनिक स्वरुप माल्टीज़ क्रॉस है; उनकी खुशबू, वायलेट फूलों की है।
इसे भी देखिये
स्रोत
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Masters and Their Retreats, s.v. “Saint Germain.”
- ↑ संत जरमेन, “आई हैव चोज़न टू बी फ्री” (मैंने स्वतंत्र होना चुना है), POW, खंड 18, अंक 30। Pearls of Wisdom, vol. १८, no. ३०.
- ↑ १ सैमुअल ८:५.
- ↑ १ सैमुअल ८:७.
- ↑ हेनरी थॉमस एंड डाना ली थॉमस, लिविंग बायोग्राफीज़ ऑफ़ ग्रेट साइंटिस्ट्स (गार्डन सिटी, न्यूयॉर्क: नेल्सन डबलडे, 1941), पृष्ठ 15.
- ↑ Henry Thomas and Dana Lee Thomas, Living Biographies of Great Scientists (Garden City, N.Y.: Nelson Doubleday, 1941), p. 15.
- ↑ डेविड वालेचिन्स्की, एमी वालेस और इरविंग वालेस द्वारा लिखित पुस्तक The Book of Predictions (न्यूयॉर्क: विलियम मॉरो एंड कंपनी, 1980), पृष्ठ 346।
- ↑ Clements R. Markham, Life of Christopher Columbus (London: George Philip and Son, 1892), pp. 207–8.
- ↑ Encyclopaedia Britannica, 15th ed., s.v. “Columbus, Christopher.”
- ↑ देखेंVirginia Fellows, The Shakespeare Code.
- ↑ मार्क प्रॉफेट, 29 दिसंबर 1967
- ↑ Mark Prophet, December 29, 1967
- ↑ वोल्टेयर (Voltaire), ओयूव्रेस, लेट्रे cxviii, सं. बेउचोट, lviii, पृष्ठ ३६०, इसाबेल कूपर-ओकले, द काउंट ऑफ़ सेंट जर्मेन(The Count of Saint Germain) (ब्लौवेल्ट, एन.वाई.: रुडोल्फ स्टीनर पब्लिकेशंस (Rudolf Steiner Publications), १९७०), पृष्ठ ९६ में उद्धृत।
- ↑ Saint Germain, “Keep My Purple Heart,” Pearls of Wisdom, vol. 31, no. 72.