Translations:Original sin/27/hi

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पाँचवीं शताब्दी में "मूल पाप" (Original Sin) एक बड़े धार्मिक विवाद का केंद्र बन गया। इस विवाद का अंतिम निर्णय 529 ईस्वी में ऑरेंज की धर्मसभा (Synod of Orange) द्वारा किया गया।

धर्मसभा ने घोषित किया कि आदम के पाप ने पूरी मानव जाति के शरीर और आत्मा को भ्रष्ट कर दिया है। पाप और मृत्यु, आदम की आज्ञा-अवज्ञा (disobedience) का परिणाम हैं।

धर्मसभा ने यह भी कहा कि पाप के कारण मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा (free will) इतनी कमजोर हो गई है कि "कोई भी व्यक्ति परमेश्वर से वैसा प्रेम नहीं कर सकता जैसा उसे करना चाहिए, न परमेश्वर पर विश्वास कर सकता है, और न ही परमेश्वर के लिए कोई अच्छा कार्य कर सकता है, जब तक कि पहले उस पर ईश्वरीय दया (divine mercy) की कृपा न हो।"

उन्होंने यह भी घोषित किया कि बपतिस्मा (baptism) के संस्कार के द्वारा मिलने वाली कृपा से सभी मनुष्य, यदि वे प्रयास करें, तो उद्धार प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्रकार, उद्धार (salvation) के लिए मानव के अपने गुणों (human merit) से अधिक महत्वपूर्ण परमेश्वर की कृपा (grace) मानी गई।