सनत कुमार और महिला दिव्यगुरु वीनस

सनत कुमार को प्राचीनतम पुरुष भी कहते हैं। वे ईसा मसीह के गुरु हैं, शुक्र ग्रह के प्रधान हैं, और सात कुमारों (सात लौ के स्वामी जो शुक्र ग्रह पर किरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं) में से एक हैं। वे हमें रूबी किरण के मार्ग पर चलने की दीक्षा देते हैं - इस बात का वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक द ओपनिंग ऑफ द सेवंथ सील में किया है।
उन्होंने पृथ्वी के इतिहास के सबसे अंधकारमय क्षणों में विश्व के भगवान का पद संभाला है। उस अँधेरे समय में पृथ्वी पर रहनेवाले मनुष्य का स्तर गुफाओं में रहने वाले प्रागैतिहासिक मानव के जैसा हो गया था, और मनुष्य ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध और अपने ईश्वरीय स्वरुप को भूल गया था। ऐसे समय, जब ईश्वर पृथ्वी ग्रह का अस्तित्व समाप्त करने वाले थे, सनत कुमार ने पृथ्वी को बचाने के लिए अपना ग्रह (शुक्र) छोड़कर पृथ्वी पर आने का निर्णय लिया। उन्होंने ये फैसला किया कि जब तक पृथ्वीवासी अपने ईश्वरीय स्वरूप को नहीं पहचानते और पुनः ईश्वर के रास्ते पर नहीं चलते तब तक वे यही रहेंगे। शुक्र ग्रह के १४४ हज़ार लोगों ने स्वेच्छापूर्वक इस कार्य में सनत कुमार की सहायता-हेतु पृथ्वी पर आने का निर्णय किया।
पृथ्वी पर उनका आना
सनत कुमार ने ब्रह्मांड के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है:
आप सब मुझे सनत कुमार के नाम से जानते हैं - वह व्यक्ति जो एक सौ चौवालीस की परिषद - जिसे ब्रह्मांडीय परिषद भी कहते हैं - के समक्ष खड़ा हुआ था। आप मुझे जानते हैं क्योंकि आप मेरी इस बात के साक्षी थे। आपके सामने ही मैंने पृथ्वी के जीवों के लिए प्रार्थना की थी - वो पृथ्वीवासी जो अपनी वास्तविक स्थिति को भूल गए थे और अपने जीवित गुरु से अलग हो गए थे। आप मुझे उस व्यक्ति के रूप में जानते हैं जो पृथ्वी पर सात स्तरों — अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी - में विकसित हो रहे जीवों में त्रिदेव ज्योत को मूर्त रूप देने के लिए स्वेच्छा से आया था।
ब्रह्मांडीय परिषद ने पृथ्वी और उसके सभी निवासियों को नष्ट का फरमान जारी किया था क्योंकि पृथ्वीवासी ईश्वर का मार्ग त्याग चुके थे, उन्होंने अपने हृदय में स्थित त्रिदेव ज्योत - जोकि त्रिमूर्ति (ब्रह्मा विष्णु महेश) का रूप है - की उपासना करना बंद कर दिया था। मनुष्य ईश्वर के रास्ते से भटक गए थे और केवल बाह्य अभिव्यक्ति पर ही ज़ोर देते थे। अज्ञानी होने के कारण मनुष्यों ने जानबूझकर ईश्वर के साथ अपने आंतरिक संबंध को त्याग दिया था।
इस प्रकार मंदिरों का प्रकाश बुझ गया था, और जिस उद्देश्य से ईश्वर ने मनुष्य को सृजित किया था — ईश्वर का जीता जागता रूप बनना — वह अब पूरा नहीं हो रहा था। सभी मनुष्य आत्मिक रूप से मर गए थे, वे एक खली पात्र, एक खोखला खोल बन गए थे। पृथ्वी पर कहीं भी रहस्य वाद का कोई विद्यालय नहीं था — न कोई शिष्य था , न ही कोई गुरु, और न ही ईश्वरत्व के मार्ग पर चलने वाला कोई साधक।
वो न्याय की घड़ी थी - सम्पूर्ण पदक्रमों के सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान परमेश्वर ने सर्वसम्मिति से बानी राय को सभी के सामने प्रस्तुत किया - पृथ्वी और वहां रहनेवाले सभी जीवों को नष्ट कर दिया जाए, उन्हें पवित्र अग्नि की मोमबत्ती की तरह प्रज्वलित किया जाए; सभी अनुपयुक्त ऊर्जाओं को ध्रुवीकरण के लिए पुनः महान केंद्रीय सूर्य में लौटा दिया जाए। इससे दुरुपयोग की गई ऊर्जा का अल्फा और ओमेगा के प्रकाश से पुनः नवीनीकरण हो जाएगा, तथा सृजन कार्य के लिए इस ऊर्जा का पुनः उपयोग किया जा सकता है।
पृथ्वी के उद्धार के लिए इस विधि की क्या आवश्यकता थी? बात यह थी कि जो भी व्यक्ति गुरु के रूप में अवतरित हो वह भौतिक जगत में उपस्थित हो और वहां का संतुलन बनाए रखे, तथा प्रत्येक जीवात्मा के लिए जीवन की त्रिदेव ज्योत को भी प्रज्वलित रखे। लॉ ऑफ वन के अनुसार अगर एक भी व्यक्ति शाश्वत ईश्वर पर अपना ध्यान केंद्रित रखता है तो वह अनेकानेक व्यक्तियों के उद्धार में सहायक होता है। जब तक कि सभी व्यक्ति अपने शब्दों और कर्मों के प्रति उत्तरदायी न हो जाएं, और अपने प्रकाश के भार के साथ-साथ अपने सापेक्ष अच्छे और बुरे कर्मों का भार वहन करना शुरू न कर दें तब तक यह व्यक्ति उनके प्रति उत्तरदायी रहता है।
मैंने वह व्यक्ति बनने का निश्चय किया। मैंने स्वेच्छा से पृथ्वी और उसके जीवों के लिए धर्म का पालन करने वाला पुत्र बनने का संकल्प लिया।
काफी विचार-विमर्श के बाद, ब्रह्मांडीय परिषद और परमपिता परमेश्वर ने मेरी याचिका को स्वीकृत किया, और इस तरह पृथ्वी और वहां रहनेवाले सभी जीवों के लिए एक नई दिव्य व्यवस्था बनाने के प्रस्ताव पारित हुआ।
मैं परमपिता परमात्मा के समक्ष नतमस्तक हुआ। उन्होंने मुझसे कहा, “पुत्र सनत कुमार तुम पृथ्वी के सभी जीवों के सामने एक श्वेत सिंहासन पर विराजमान होगे। तुम उनके लिए सर्वोच्च प्रभु, परमेश्वर होगे। तुम उनके लिए देवत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति होगे। सभी पृथ्वीवासियों को भी ऐसी शिक्षा और दीक्षा दी जायेगी ताकि उनकी जीवात्माएं भी सत्य के मार्ग पर चल कर तुम्हारे सिंहासन तक पहुंच पाएं, अपने ईस्वरीय स्वरूप को पहचान पाएं। जिस दिन वे सब यह कहेंगे कि "सिंहासन पर बैठे व्यक्ति को सदा-सर्वदा आशीर्वाद, सम्मान, महिमा और शक्ति मिले, उस दिन उनका भी उद्धार होगा"।
सर्वोच्च ईश्वर ने मुझसे कहा, “इस प्रकार पृथ्वी के विकास के लिए तू ही अल्फा और ओमेगा होगा, तू ही आदि और अंत होगा, यह एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहा था"। उन्होंने अपने संरक्षण का सम्पूर्ण दायित्व मुझ पर डाल दिया, उन्होंने मुझे उस जीवनधारा का संरक्षक बना दिया जो उन्होंने स्वयं बनायी थी। यह उनका मुझमें विश्वास था। यह पिता द्वारा पुत्र को दी गयी दीक्षा थी...
और फिर एक सौ चौवालीस की परिषद ने महान श्वेत सिंहासन के चारों ओर एक सौर गोला बनाया। इसके बाद उन्होंने सिंहासन के चारों ओर आंतरिक वृत्त में स्थित प्रकाश के महान प्राणियों के साथ मिलकर जप करना शुरू किया, “सर्वशक्तिमान प्रभु, परमेश्वर हमेशा से पवित्र थे, हैं और आने वाले समय मैं भो पवित्र होंगे"। मैंने उनके इस जप को सुना जो 'सुबह के तारे' तक सुनाई दे रहा था। मेरी समरूप जोड़ी वीनस (जिसे आप शुक्र के नाम से जानते हैं) तथा इस ग्रह पर रहने वाले सभी जीवों ने भी इस जप को सुना।
प्रकाश के संदेशवाहकों ने मेरे आगमन, और ब्रह्मांडीय परिषद द्वारा दी गयी अनुमति की घोषणा की थी। मेरे छह भाई, पवित्र कुमार, जो मेरे साथ सात किरणों की सात ज्वालाओं को धारण करते हैं, माइटी विक्ट्री और उनकी सेना, हमारी पुत्री, मेटा, और अनेक सेवक-सेविकाएं जिन्हें आप दिव्य गुरुओं के रूप में जानते हैं - सभी ने मेरा भव्य स्वागत किया। उस शाम सभी के मन में पृथ्वी को बचाने का अवसर मिलने पर प्रसन्नता थी परन्तु साथ ही बिछुड़ने का दुःख भी था। मैंने स्वेच्छा से एक अंधकारमय ग्रह पर जाने के निर्णय किया था। और यद्यपि यह नियत था कि पृथ्वी स्वतंत्रता का तारा होगी, पर हम सभी जानते थे कि यह काम आसान नहीं था, मेरे लिए मानों यह जीवात्मा की एक लंबी अंधकारमय रात थी।
फिर अचानक घाटियों और पर्वतों से लोगों का एक विशाल समूह प्रकट हुआ - हमने देखा एक लाख चौवालीस हज़ार जीवात्मांएं हमारे महल की ओर आ रही थीं। वे बारह समूहों में हुए थे तथा स्वतंत्रता, प्रेम और विजय के गीत गाते हुए धीरे-धीरे पास आ रहे थे। उनके गीत चारों ओर गूँज रहे थे - देवदूतों के समूह भी आस-पास मंडरा रहे थे। तभी बालकनी से मैंने और वीनस ने देखा तो एक तेरहवां समूह दिखा - इन्होनें सफेद वस्त्र पहन रखे थे। ये मेल्किज़ेडेक संघ के शाही पुरोहित थे - ये वो अभिषिक्त लोग थे जो इस पदानुक्रमित इकाई के केंद्र में लौ और कानून को बनाए रखते थे।
सभी लोग हमारे घर के चारों ओर घेरा बनाकर खड़े हो गए, और जब मेरे प्रति उनकी स्तुति और आराधना का गीत समाप्त हो गए तब उस विशाल जन-समूह के नेता ने हमें संबोधित किया। ये नेता वो थे जिन्हें आप आज जगत के स्वामी गौतम बुद्ध के रूप में जानते और प्रेम करते हैं। उन्होंने कहा, “हे युगों के परमेश्वर, हमने उस वचन के बारे में सुना है जो परमपिता परमेश्वर ने आज आपको दिया है, और आपकी उस प्रतिज्ञा के बारे में भी सुना है जो आपने पृथ्वी पर जीवन की लौ को पुनः लाने के लिए ली है। आप हमारे गुरु हैं, हमारा जीवन और हमारे ईश्वर भी हैं। हम आपको अकेले नहीं जाने देंगे। हम भी आपके साथ चलेंगे। हम एक क्षण के लिए भी आपको अपने शिष्यत्व के बंधन से मुक्त नहीं होने देंगे। हम पृथ्वी पर आपका मार्ग प्रशस्त करेंगे। हम पृथ्वी पर आपके नाम की लौ को जलाए रखेंगे।”
और फिर परमपिता परमेश्वर के आदेश के अनुसार मैंने उनमें से चार सौ लोगों को चुना - इन चार सौ लोगों का काम पृथ्वी पर एक लाख चौवालीस हजार लोगों के आगमन की तैयारी करना था। यद्यपि वे पृथ्वी पर फैले घोर अंधकार के बारे में जानते थे, वास्तव में वे उस बलिदान का वास्तविक अर्थ नहीं जानते थे जो वे अपने गुरु के लिए दे रहे - वो सिर्फ मैं जानता था।
खुशी के मारे हमारी आँखों में आंसू आ गए, मैं, वीनस और एक लाख चौवालीस हजार लोग रो रहे थे। उस यादगार शाम जो आंसू बहे, वे उस पवित्र अग्नि की तरह थे जो महान श्वेत सिंहासन, ब्रह्मांडीय परिषद, और हमारे संरक्षकों से जीवन में बह रही थी।[1]
शम्बाला का निर्माण
इस प्रकार से जब सनत कुमार शुक्र ग्रह से पृथ्वी पर कुछ समय रहने के लिए आए तो उनके साथ प्रकाश के कई महान प्राणियों का एक दल था जिनमें उनकी पुत्री (देवी मेटा) और सात पवित्र कुमारों में से तीन शामिल थे। चार सौ लोगों को पहले भेजा गया - उनका काम गोबी सागर में एक द्वीप (जहाँ पर आज गोबी रेगिस्तान स्थित है) पर एक भव्य आश्रम शम्बाला का निर्माण करना था। उनके साथ कुछ रसायनशास्त्री और वैज्ञानिक भी आए थे - इनमें से एक सौ चौवालीस का काम तत्वों की एक सौ चौवालीस ज्वालाओं को केंद्रित करना था। उन सब ने मिलकर ग्रेट हब में स्थित हीरे की एक प्रतिकृति भी बनाई जो ईश्वर के हीरे जैसे चमकती बुद्धि का केंद्र है।
गोबी सागर में स्थित व्हाइट आइलैंड पर उन्होंने सिटी ऑफ़ व्हाइट का निर्माण किया - यह शहर शुक्र ग्रह पर स्थित कुमारों के नगर की तरह ही बनाया था। सनत कुमार ने शम्बाला के आश्रम में त्रिदेव ज्योत का केंद्र स्थापित किया, जो कई शताब्दियों तक भौतिक रूप में यहाँ विद्यमान रहा। सनत कुमार स्वयं इस आश्रम में रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी हमारे जैसे भौतिक शरीर का धारण नहीं किया - भौतिक ब्रह्मांड में होने के बावजूद उनका शरीर अत्यंत सूक्ष्म था।
बाद में इस आश्रम की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक हो गया कि इसे भौतिक जगत से हटाकर आकाशीय स्थल में स्थानांतरित कर दिया जाए। आकाशीय स्थल में स्थित यह स्थान भौतिक आश्रम का हूबहू प्रतिरूप है। नीले पानी वाला गोबी सागर जिसके मध्य में वाइट आइलैंड स्थित था, आज एक मरुस्थल है।
पृथ्वी पर सनत कुमार का ध्येय
सनत कुमार ने अपने हृदय से निकलने वाली प्रकाश की एक किरण से पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक प्राणी के साथ संपर्क स्थापित किया। इसके द्वारा उन्होंने प्रत्येक प्राणी को अपने पवित्र आत्मिक स्व को पहचानने में सहायता की जिससे उनमें आत्मिक चेतना की उत्पत्ति हुई। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो संपूर्ण मानवजाति अवश्य ही मृत्यु को प्राप्त करती, और पृथ्वी भी नष्ट हो जाती।
यूल लॉग जलाने की प्राचीन प्रथा सनत कुमार की इसी सेवा का प्रतीक है - सनत कुमार प्रत्येक वर्ष भौतिक सप्तकों में पवित्र अग्नि का केंद्र स्थापित करते थे। समय के साथ यह एक परंपरा बन गई थी - लोग मीलों दूर से यूल लॉग का एक टुकड़ा लेने के लिए आते थे, और फिर पूरा साल उस से अपने घर में आग जलाते थे। इस प्रकार, सनत कुमार की भौतिक ज्वाला का केंद्र पृथ्वीवासियों के घरों में प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता था, और यही लोगों का सनत कुमार से प्रत्यक्ष संपर्क करने का साधन भी था।
१ जनवरी १९५६ को जब सनत कुमार के सबसे योग्य शिष्य गौतम बुद्ध को विश्व के स्वामी का पद प्रदान किया गया, सनत कुमार का पृथ्वी आने का मिशन समाप्त हो गया। गौतम बुद्ध के पास पृथ्वी का संतुलन बनाए रखने और त्रिदेव ज्योत का केंद्र बिंदु बने रहने की पर्याप्त सामर्थ्य थी। इसके बाद सनत कुमार विश्व के शासक बने, और इस रूप में वे शुक्र ग्रह पर स्थित अपने निवास से पृथ्वी के विकास में निरंतर सहयोग करते रहे हैं।
इस पदक्रम परिवर्तन से पहले सनत कुमार प्रत्येक वर्ष वृषभ राशि में पूर्णिमा के दौरान वेसाक महोत्सव पर पृथ्वी पर अपार प्रकाश फैलाते थे। उनका यह प्रकाश उनके शिष्यों, गौतम बुद्ध, मैत्रेय और महा चोहान के पद पर आसीन व्यक्ति के माध्यम से प्रसारित होता था। ये तीनों विश्व के स्वामी की तरफ से सनत कुमार के हृदय से निकलने वाली त्रिदेव ज्योत के केंद्र को सहारा देते थे। सनत कुमार के तीव्र प्रकाश के लिए ये तीनो स्टेप-डाउन ट्रान्सफ़ॉर्मर का काम करते थे।
विश्व के विभिन्न धर्मों में सनत कुमार का स्थान
पूर्वी विश्व की धार्मिक परंपराओं में भी सनत कुमार अनेक भूमिकाओं में दिखाई देते हैं, और प्रत्येक भूमिका उनके दिव्य स्वरूप के एक नए पहलू को उजागर करती है। हिंदू धर्म में उन्हें ब्रह्मा के पुत्र के रूप में पूजा जाता है। उन्हें पवित्र युवक के रूप में चित्रित किया जाता है। संस्कृत भाशा में सनत कुमार का अर्थ "सदा युवा" है। सभी कुमारों में वे सबसे विशिष्ट हैं।

हिंदू धर्म
हिंदू धर्म में सनत कुमार को कभी-कभी स्कंद या कार्तिकेय भी कहा जाता है, जो शिव और पार्वती के पुत्र हैं। कार्तिकेय युद्ध के देवता और देवताओं की दिव्य सेना के सेनापति हैं। उनका जन्म विशेष रूप से तारक नमक राक्षस का वध करने के लिए हुआ था - तारक अज्ञान का प्रतीक है। कार्तिकेय को अक्सर भाला धारण किए हुए दर्शाया जाता है - भाला ज्ञान का प्रतीक है। वे भाले का उपयोग अज्ञान का वध करने के लिए करते हैं। हिंदू धर्म में युद्ध की कहानियों को अक्सर जीवात्मा के आंतरिक संघर्षों को दर्शाने के लिए किया जाता है।
भारतीय लेखक ए. पार्थसारथी कहते हैं कि कार्तिकेय उस "पूर्ण पुरुष" का दर्शाते हैं जिन्होंने परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लिया है। उनका विनाशकारी भाला उन सभी नकारात्मक प्रवृत्तियों के नाश का प्रतीक है जो मनुष्य के दिव्य स्व को ढक लेती हैं।[2]
उत्तर भारत में पाँचवीं शताब्दी के एक पत्थर के स्तंभ पर खुदे एक शिलालेख में स्कंद को दिव्य माताओं का संरक्षक बताया गया है।[3] कार्तिकेय को कभी-कभी छह सिरों के साथ चित्रित किया जाता है। एक कथा के अनुसार, कार्तिकेय का पालन-पोषण छह प्लीएड्स ने किया था और उनके छह चेहरे इसलिए विकसित हुए ताकि वे प्रत्येक से प्रत्येक प्लीएड्स से दूध पी सकें। एक अन्य कथा के अनुसार, उनका जन्म चमत्कारिक रूप से छह कुंवारी स्त्रियों के छह पुत्रों के रूप में हुआ था। शिव की पत्नी पार्वती ने सभी छह शिशुओं को इतने स्नेह से गले लगाया कि वे छह सिरों वाले एक व्यक्ति बन गए।[4] “कार्तिकेय।” समीक्षक आर. एस. नाथन कहते हैं, “छह सिर छह अलग दिशाओं में विवेक शक्ति के उपयोग का प्रतीक हैं, ताकि उन छह गुणों को नियंत्रण में रखा जा सके जो मनुष्य को उसकी आध्यात्मिक प्रगति से रोकते हैं।”[5]
मार्गरेट और जेम्स स्टटली ने हार्पर डिक्शनरी ऑफ हिंदूइज्म में लिखा है कि स्कंद का जन्म तब हुआ जब शिव ने, "अपनी सहज प्रवृत्तियों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करने के बाद, अपनी यौन ऊर्जा को आध्यात्मिक और बौद्धिक उद्देश्यों के लिए लगाया।"[6] कई दन्तकथाओं में बताया गया है कि कार्तिकेय का जन्म माँ के बगैर हुआ था - गंगा में गिरे शिव के शुक्राणु से उनकी उत्पत्ति हुई थी।
दक्षिण भारत में कार्तिकेय को सुब्रमण्य के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है "ब्राह्मणों के प्रिय" - ब्राह्मण पुरोहित वर्ग के सदस्य हैं। छोटे से छोटे गाँव में भी सुब्रमण्य का एक मंदिर या तीर्थस्थल तो है ही।
कभी कभी इन्हें स्कंद-कार्तिकेय के नाम से भी पुकारा जाता है - स्कंद-कार्तिकेय को ज्ञान और विद्या का देवता माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि वे अपने भक्तों को आध्यात्मिक शक्तियाँ, विशेषकर ज्ञान की शक्ति प्रदान करते हैं। हिंदू रहस्यवादी परंपरा में, कार्तिकेय को 'गुहा' के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है "गुफा" या "गुप्त", क्योंकि वे हृदय की गुफा में निवास करते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों में सनत कुमार को "ऋषियों में श्रेष्ठ" और ब्रह्म का ज्ञाता बताया गया है।
पारसी धर्म
दिव्यगुरूओं के अनुसार, अहुरा मज़्दा, जिन्हें पारसी धर्म के अनुयायी अपना ईश्वर कहते हैं, वास्तव में सनत कुमार ही हैं। अहुरा मज़्दा का अर्थ है "बुद्धिमान भगवान" या "बुद्धि प्रदान करने वाले भगवान"। वे अच्छाई के सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हैं और मानव जाति के रक्षक हैं तथा बुराई के सिद्धांत के विरोधी हैं।
ईसा पूर्व सन् १७०० से ६०० के बीच, ज़राथुस्त्र ने प्राचीन फारस में पारसी धर्म की स्थापना की। माना जाता है कि एक दिन सुबह जब वे नदी से पानी लेने गए तो उन्हें एक तेजस्वी व्यक्ति दिखाई दिया - वह व्यक्ति उन्हें अहूरा मज़्दा और पाँच अन्य तेजस्वी व्यक्तियों के पास ले गया। उन सब में इतना तेज था कि ज़राथुस्त्र को अपनी परछाई तक नहीं दिखाई दी। इन लोगों ने उन्हें पारसी धर्म के बारे में बताया। इसके कुछ ही समय बाद, ज़राथुस्त्र अहूरा मज़्दा के प्रवक्ता बन गए।

दीपांकर
शम्बाला के आकाश में विलीन होने के बाद, सनत कुमार ने दीपांकर (दीप प्रज्वलित बुद्ध) के रूप में अवतार लिया। दीपांकर संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है "प्रकाश प्रज्वलित करने वाला" या "प्रकाशमान"। बौद्ध परंपरा के अनुसार, दीपांकर प्राचीन समय के बुद्ध हैं - गौतम बुद्ध से पहले आने वाले चौबीस बुद्धों में ये सबसे पहले थे। दीपांकर ने भविष्यवाणी की थी कि तपस्वी सुमेधा भविष्य में बुद्ध गौतम बनेंगे।
बौद्ध धर्म में दीपांकर , गौतम बुद्ध और भगवान मैत्रेय को "तीनों कालों — भूतकाल, वर्तमान और भविष्य — के बुद्ध" माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि दीपांकर पुराने समय में विश्व स्वामी थे, गौतम बुद्ध इस वक्त विश्व के स्वामी हैं और मैत्रेय आगेआने वाले समय में विश्व के स्वामी होंगे।
लेखिका एलिस गेटी लिखती हैं:
ऐसा माना जाता है कि दीपांकर बुद्ध पृथ्वी पर एक लाख वर्ष तक रहे। उन्हें तीन हज़ार वर्ष लग गए एक ऐसा व्यक्ति ढूंढने में जो दिव्य सत्य को सुनने के योग्य हो। इसके बाद उन्होंने संसार को परिवर्तित करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने दीपक से एक विशाल नगर निकाला और उसे स्थापित किया। जंबूद्वीप (भारत) के लोग इस चमत्कार को देख रहे थे, उन्होंने देखा कि चारों दीवारों से प्रखर लपटे निकल रहीं थीं। अत्यंत भयभीत हो अपने बचाव के लिए वे बुद्ध ओर ताकने लगे। तब इस जलते हुए शहर से निकल दीपांकर जंबूद्वीप में आये, सिंहासन पर बैठे और उन्होंने धर्म का उपदेश देना शुरू किया।[7]

बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म में ब्रह्मा सनमकुमार नामक एक महान देवता हैं। इनके नाम का अर्थ है "वह व्यक्ति जो सदा युवा रहता है"। ब्रह्मा सनमकुमार इतनी उच्च कोटि के देवता हैं कि स्वर्ग के ३३ देवता भी उन्हें तब ही देख पाते हैं जब ब्रह्मा सनमकुमार एक परछाईं वाला शरीर धारण करते हैं। देवताओं के स्वामी सक्का ने उनके स्वरूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है: "वे अन्य सभी देवताओं से कहीं अधिक ओजस्वी हैं। जैसे मनुष्य सोने से बनी मूर्ति के सामने कांतिहीन हो जाता है वैसे ही देवता ब्रह्मा सनमकुमार के सामने आभाहीन प्रतीत होते हैं।"[8]
ईसाई धर्म
पैगंबर डैनियल ने सनत कुमार के दर्शन किये थे। उन्होंने सनत कुमार को "प्राचीन काल के देवता" कहा। डैनियल लिखते हैं:
मैंने देखा कि सिंहासन नीचे लाये जा रहे थे, उनमें प्राचीन काल के देवता बैठे थे; उन्होंने बर्फ के सामान श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे, और उनके सिर के केश शुद्ध ऊन के समान प्रतीत हो रहे थे; उसका सिंहासन मानों अग्नि की लपटों हों, और चक्र जलती हुई आग के गोले थे।[9]
बुक ऑफ रेवेलशन में सनत कुमार को 'महान श्वेत सिंहासन पर बैठे हुए देखा गया है'।
और मैंने एक महान श्वेत सिंहासन देखा और उस पर बैठे हुए व्यक्ति को भी देखा। उनके चेहरे से पृथ्वी और आकाश दोनों हे लुप्त हो गए थे, उनके लिए अब यहाँ कोई स्थान नहीं था - यह पुराने, पापी संसार के पतन का, वर्तमान सृष्टि के अंत को दर्शा रहा था; पतित वस्तुयें दिव्य पवित्रता की उपस्थिति को सहन नहीं कर सकती। इसका अर्थ यह भी है कि ईश्वर एक नए शाश्वत स्वर्ग और नई पृथ्वी की तैयारी के लिए पुराने ब्रह्मांड के पूर्ण रूप निष्कासित करते हैं जोकि ईश्वरीय न्याय है।[10]
अध्यात्मविद्या में
हेलेना ब्लावत्स्की ने अपनी पुस्तक द सीक्रेट डॉक्ट्रिन में सनत कुमार को "महान बलिदानी" कहा है, क्योंकि उन्होंने निम्न लोकों में फंसी हुई जीवात्माओं के उद्धार के लिए स्वयं को प्रकाश के लोक से निर्वासित कर लिया था। वह लिखती हैं:
प्रकाश की दहलीज पर बैठे हुए, सनत कुमार अंधकार के घेरे के भीतर से प्रकाश को देखते हैं, यह अँधेरा घेरा वे पार नहीं करेंगे और ना ही वे जीवन-पर्यन्त अपना स्थान छोड़ेंगे। यह एकाकी पहरेदार क्यों सदैव अपने स्वयं के चुने हुए स्थान पर बैठे रहते हैं?... वो इसलिए क्योंकि पृथ्वीवासी अपने असली घर लौटने की प्रक्रिया में हैं, वे इस जीवन चक्र से थक चुके हैं परन्तु किसी भी क्षण वे अपने रास्ते से भटक सकते हैं, भौतिक जगत के मायाजाल में पुनः फँस सकते हैं। सनत कुमार इन सभी जीवों को रास्ता दिखाने के लिए खड़े हैं, वे चौक्कन्ने हैं कि कोई रास्ता न भटके। सनत कुमार ने मनुष्यों के लिए स्वयं का बलिदान दिया है, और कुछ गिने चुने लोगों को इस बलिदान का फायदा अवश्य हो सकता है।
इस महान गुरु के प्रत्यक्ष, मौन मार्गदर्शन द्वारा ही मानव चेतना के प्रथम जागरण से लेकर अब तक सभी शिक्षक और प्रशिक्षक मानवता के मार्गदर्शक बने। "ईश्वर के इन्हीं पुत्रों" के माध्यम से मानवता ने कला और विज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान की भी प्राप्ति की; और इन्हीं ने उन प्राचीन सभ्यताओं की पहली नींव भी रखी, जो हमारी आधुनिक पीढ़ी के छात्रों और विद्वानों को अत्यंत आश्चर्यचकित करती हैं।[11]
अपनी पुस्तक द मास्टर्स एंड द पाथ में, सी. डब्ल्यू. लीडबीटर (ये उस समय के लेखक थे जब सनत कुमार विश्व के स्वामी के पद पर आसीन थे) ने सनत कुमार का वर्णन किया है।
हमारी दुनिया एक आध्यात्मिक राजा द्वारा शासित है — यह राजा शुक्र ग्रह से बहुत समय पहले आए लौ के देवताओं में से एक हैं। हिंदू उन्हें सनत कुमार कहते हैं, कुमार शब्द एक उपाधि है, जिसका अर्थ है राजकुमार या शासक। उन्हें अन्य नामों से भी पुकारा जाता है जैसे कि एकमात्र आरंभकर्ता, अद्वितीय- जिसके सामान कोई दूसरा नहीं, शाश्वत युवा; और अक्सर हम उन्हें विश्व के स्वामी कहते हैं। वे सर्वोच्च शासक हैं; उनके हाथ में और उनकी आभा में पूरा पृथ्वी ग्रह समाहित है। वे इस दुनिया के लोगो का प्रतिनिधित्व करते हैं और ग्रह के संपूर्ण विकास के निर्देशक हैं — न केवल मनुष्य, बल्कि देवताओं, सृष्टि देवो और पृथ्वी से जुड़े अन्य सभी प्राणियों के विकास को भी निर्देशित करते हैं।
उनके मन में मनुष्य के उच्चतम विकास की संपूर्ण योजना है पर उसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। वे ही संपूर्ण विश्व को संचालित करने वाली शक्ति हैं, और इस ग्रह पर दिव्य इच्छा का साकार स्वरूप हैं। शक्ति, साहस, दृढ़ निश्चय, लगन और ऐसे ही सभी सदगुण जो मनुष्य के जीवन में प्रकट होते हैं, उन्हीं को प्रतिबिंबित करते हैं। उनकी चेतना इतनी विस्तृत है कि वह हमारे ग्रह पर मौजूद सभी जीवात्माओं को एक साथ समझ लेती है। उनके पास विनाश की समस्त शक्तियाँ हैं, क्योंकि वे फोहाट के उच्च रूपों का प्रयोग करते हैं और हमारी श्रृंखला से परे की ब्रह्मांडीय शक्तियों से भी संपर्क कर सकते हैं।
ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले सभी साधक एक निश्चित पड़ाव पर औपचारिक रूप से विश्व के स्वामी से मिलते हैं। जो भी लोग उनसे प्रत्यक्ष मिले हैं, वे उनका वर्णन एक सुंदर, गरिमामय, सौम्य और अत्यंत दयालु युवक के रूप में करते हैं; उनके चेहरे पर सर्वज्ञता और रहस्यमय महिमा का एक ऐसा भाव है, जो अदम्य शक्ति का आभास देता है ऐसी शक्ति कि कुछ लोग तो उनकी दृष्टि सहन भी नहीं कर पाते, और भय से अपना चेहरा ढक लेते हैं... इस अनुभव को प्राप्त करने वाला व्यक्ति इसे कभी नहीं भूल सकता, और न ही वह इसके बाद कभी इस बात पर संदेह कर सकता है कि पृथ्वी पर पाप और दुख चाहे कितने भी भयानक क्यों न हों, पृथ्वी की सभी वस्तुएं एक-दुसरे से जुड़ी हुई हैं, और सब कुछ अंततः सभी के कल्याण के लिए ही हो रहा है; मानवता अपने अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर है।[12]
महिला दिव्य गुरु वीनस

सनत कुमार की समरूप जोड़ी लेडी मास्टर वीनस हैं। पृथ्वी पर सनत कुमार के लंबे आवास के दौरान, वे अपने गृह ग्रह, शुक्र, पर ही रहीं। १९५६ में सनत कुमार की वापसी के कुछ वर्षों बाद, लेडी वीनस पृथ्वी पर आईं। २५ मई, १९७५ को उन्होंने घोषणा की कि जिस प्रकार सनत कुमार ने पृथ्वी की लौ को जीवित रखा था, वह भी उस कार्य के लिए कुछ समय तक पृथ्वी पर रहेंगी। उन्होंने कहा:
मैं चेतना की एक तीक्षण गति को पृथ्वी पर भेज रही हूँ ताकि कि वे सभी गतिविधियां जो मनुष्य को दिव्यता प्राप्त करने के रास्ते से रोकती हैं, स्थगित हो जाएँ... देखते हैं कि माँ की लौ पर मानवजाति कैसी प्रतिक्रिया देती है? - क्या वैसी ही जैसी सनत कुमार के प्रकाश पर दी थी या नहीं।
पृथ्वी पर वापसी
४ जुलाई १९७७ को सनत कुमार ने कहा:
ब्रह्मांडीय परिषद और कर्म के स्वामी ने मुझे तब तक पृथ्वी पर रहने की अनुमति दी है जब तक कि यहाँ रहनेवाले उच्च चेतना के मालिक लोगों के हृदय पूर्ण रूप से (ईश्वर के मार्ग पर चलने के लिए) स्वतंत्र न हो जाएँ...
मैं अपने शरीर को इस्राएल के लोगों के बीच एक जीवित वेदी के रूप में स्थापित करता हूँ। [13] और उस शरीर-रूपी मंदिर में ही पवित्र जीवात्मा का वास है, जीवात्मा का वह रूप ईश्वर के प्रत्येक पुत्र और पुत्री के लिए आत्मा का मूल स्वरूप है। ब्रह्मांडीय माँ की यही इच्छा है कि उसकी कोई भी संतान - पुत्र हो या पुत्री - इस भवसागर में खो न जाए।
और इस प्रकार मैं, और लेडी मास्टर वीनस - जो पिछले कई महीनों से आपके साथ हैं - साथ मिलकर पवित्र नगरी यरूशलेम में अपनी जुड़वां लौ पर ध्यान केंद्रित करते हैं। हम पवित्र आत्मा के उस समुदाय के विजयी होने के लिए खड़े हैं, जिसका इस युग में प्रकट होना प्रकाश (ज्ञान) के प्रसार के लिए आवश्यक है।
४ जुलाई, १९७८ को दिए गए अपने एक प्रवचन में सनत कुमार ने हमें बताया कि प्राचीन समय में वे जिस रात भौतिक जगत में आये थे उसी रात को वे अब भौतिक जगत में प्रदर्शित कर रहे थे। उन्होंने कहा "मैं पृथ्वी पर उस पुराने समय का पूरा प्रकाश भेज रहा हूँ। शम्बाला में आने के बाद मैं ऐसा पहली बार कर रहा हूँ।"
मूल राग
सनत कुमार के मूल राग की धुन को जान सिबेलियस ने अपनी रचना फिनलैंडिया में दर्शाया था। इस राग में इतनी शक्ति है कि १८०९ से १९१७ के दौरान जब फिनलैंड रूस के अधीन था तो रूसी सरकार ने इस धुन को बजाने पर प्रतिबन्ध लगा रखा था - रूस को डर था की कहीं ऐसा न हो कि यह लोगों में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक नया जोश जगा दे। सिबेलियस का संगीत - जिसमे फ़िनलैंड के महाकाव्य और किम्वदनातियों की भावनाएं समाहित हैं - वहां के निवासियों को स्वतंत्रता आंदोलन करने के लिए प्रेरित करता रहा। "फिनलैंडिया" स्वतंत्रता आंदोलन से इतना जुड़ गया तह था कि रूस के ज़ार (सम्राट) ने राजनीतिक संकट के उस दौर में इसके प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा रखा था।</ref>
अधिक जानकारी के लिए
Elizabeth Clare Prophet, The Opening of the Seventh Seal: Sanat Kumara on the Path of the Ruby Ray
इसे भी देखिये
स्रोत
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Masters and Their Retreats, स.व. “सनत कुमार और लेडी मास्टर वीनस.”
एलिज़ाबेथ क्लेयर प्रोफेट, २ जुलाई १९९३
एलिज़ाबेथ क्लेयर प्रोफेट, ११ दिसम्बर १९९६
एलिज़ाबेथ क्लेयर प्रोफेट, ३१ दिसम्बर १९९६
Pearls of Wisdom, vol. ३५, no. ४२ ११ अक्टूबर १९९२.
Pearls of Wisdom, vol. ३८, no. २०, ७ मई १९९५. अंतिम टिपण्णी २
- ↑ Elizabeth Clare Prophet, The Opening of the Seventh Seal: Sanat Kumara on the Path of the Ruby Ray, पृ. ११–१५.
- ↑ ए. पार्थसारथी, स्य्म्बोलिस्म इन हिन्दुइस्म", पृष्ठ १५१.
- ↑ बनर्जी, हिंदू आईकोनोग्राफी , पृ. ३६३–६४.
- ↑ मार्गरेट स्टटली और जेम्स स्टटली की किताब, हार्पर डिक्शनरी ऑफ़ हिन्दुइस्म (हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स, १९८४), पृ. १४४; एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, १९६३, एस.वी.
- ↑ आर. एस. नाथन, स्य्म्बोलिस्म इन हिन्दुइस्म (सेंट्रल चिन्मय मिशन ट्रस्ट, १९८३), पृष्ठ २०.
- ↑ हार्पर डिक्शनरी ऑफ हिंदूइज्म, पृष्ठ २८२ नोट ३.
- ↑ एलिस गेटी, द गॉड ऑफ़ नॉर्थेर्न बुद्धिज़्म (ऑक्सफोर्ड: द क्लेरेंडन प्रेस, १९१४), पृष्ठ १३-१४.
- ↑ मौरिस वाल्श, अनुवादक, दस हैव आई हर्ड: द लॉन्ग डिस्कोर्सेस ऑफ द बुद्धा दीघा निकया (लंदन: विजडम पब्लिकेशन्स, १९८७), पृष्ठ २९५–९६।
- ↑ दानियेल। ७:९
- ↑ रेव. २०:११. देखियेElizabeth Clare Prophet, The Opening of the Seventh Seal: Sanat Kumara on the Path of the Ruby Ray, पृष्ठ. १३.
- ↑ ब्लावत्स्की, चार्ल्स डब्ल्यू. लीडबीटर द्वारा उद्धृत, द मास्टर्स एंड द पाथ, पृष्ठ २९९।
- ↑ लीडबीटर, द मास्टर्स एंड द पाथ, पृष्ठ २९६।
- ↑ यहाँ इस्राएल शब्द का अर्थ उन सभी लोगों के समूह से है जो सनत कुमार के साथ पृथ्वी पर आये थे, जिनमें ईश्वरीय चेतना समाहित है, न कि केवल यहूदी लोगों से। दिव्यगुरु हमें यह बताते हैं कि ईश्वरीय चेतना वाले मनुष्य सभी जातियों, वंशों और राष्ट्रों में अवतरित हुए हैं। इस्राएली शब्द का अर्थ उस व्यक्ति से है जिसमें वास्तव में ईश्वरीय गुण हैं। हिब्रू में, इस्राएल का अर्थ उस व्यक्ति से है, "जो ईश्वर के रूप में शासन करता है" या "ईश्वर के सामान है।"