जीवात्मा

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"परमेश्वर आत्मा (Spirit) हैं, और जीवात्मा (Soul) परमेश्वर की जीवित संभावना (Living Potential) है। जीवात्मा की स्वतंत्र इच्छा (Free Will) की आकांक्षा तथा उसका परमेश्वर से पृथक हो जाना ही इस दिव्य संभावना के भौतिक शरीर (Flesh) की निम्न अवस्था में अवतरण का कारण बना।

अपमान (Dishonor) की अवस्था में बोई गई जीवात्मा का भाग्य यह है कि वह सम्मान (Honor) के साथ पुनः उठाई जाए और उस दिव्य अवस्था (God-estate) की पूर्णता को प्राप्त करे, जो समस्त जीवन की एकमात्र आत्मा (One Spirit of All Life) है।

जीवात्मा खो सकती है, परंतु आत्मा (Spirit) कभी नहीं मरती।"

"जीवात्मा (Soul) एक पतित संभावना (Fallen Potential) के रूप में बनी रहती है, जिसे आत्मा (Spirit) की वास्तविकता से ओत-प्रोत किया जाना, प्रार्थना (Prayer) और विनयपूर्ण प्रार्थना (Supplication) द्वारा शुद्ध किया जाना, तथा उस महिमा (Glory) और उस अखंड एकत्व (Unity of the Whole) में पुनः लौटाया जाना आवश्यक है, जहाँ से वह अवतरित हुई थी।

जीवात्मा का आत्मा (Spirit) के साथ यह पुनर्मिलन ही 'रसायनिक विवाह' (Alchemical Marriage) कहलाता है, जो व्यक्ति के भाग्य (Destiny) का निर्धारण करता है और उसे अमर सत्य (Immortal Truth) के साथ एक कर देता है।

जब यह पवित्र प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है, तब सर्वोच्च आत्मस्वरूप (Highest Self) जीवन के प्रभु (Lord of Life) के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, और मनुष्य में साकार हुई परमेश्वर की संभावना (Potential of God) ही अंततः 'सर्वस्व में सर्वस्व' (All-in-all) सिद्ध होती है।"

जीवात्मा की उत्पत्ति

"आचार्य मोर्या जीवात्मा की उत्पत्ति का इस प्रकार वर्णन करते हैं:"

"आइए... हम देखें कि उस अनंत परम सत्ता (Infinite One) का कितना अंश उस निकटवर्ती चेतना-क्षेत्र (Immediate Forcefield) में साकार हुआ है, जिसे तुम अपना 'स्व' (Self) कहते हो।

निस्संदेह, इस स्व का बीज (Seed of the Self) महान दिव्य स्व (Great God Self) से ही उत्पन्न हुआ होगा, क्योंकि उसके अतिरिक्त कोई अन्य स्रोत नहीं है, जहाँ से वह आ सकता था।

जीवन के महान मोनाड (Great Monad of Life) के विभिन्न लोकों (Spheres) से होकर यात्रा करते हुए, आत्म-जागरूकता (Self-awareness) का यह बीज प्रकाश के तंतुओं (Skeins of Light) को एकत्र करता है—धागा-धागा जोड़ते हुए, उन्हें लपेटते और बुनते हुए, बार-बार उस चेतना-बिंदु (Point of Awareness) के चारों ओर बुनता जाता है और इस प्रकार एक ऊर्जा-क्षेत्र (Energy Field) का निर्माण करता है।

और वह बीज एक जीवात्मा (Soul) बन जाता है, जो आत्मा (Spirit) के जीवन (Life) के साथ अपने ही दिव्य मिलन से जन्म लेती है।

और जीवात्मा एक लघु सूर्य (Miniature Sun) है, जो सार्वभौमिक सत्ता (Universal Being) के केंद्रीय सूर्य (Central Sun) की परिक्रमा करता रहता है...."

"ईश्वरीय सत्ता (God-being) का क्षेत्र (Sphere) एक घूमते हुए दिव्य परमाणु (Whirling Atom) के समान है, जिसे अल्फ़ा-से-ओमेगा (Alpha-to-Omega) कहा जाता है।

'मैं हूँ जो मैं हूँ' (I AM THAT I AM) की ध्रुवीयता (Polarity) के इस दिव्य घूर्णन से जीवात्मा (Soul) का बीज जन्म लेता है।

और जब वह मोनाड (Monad) के चक्रों (Cycles) से होकर यात्रा करता है, तब वह अपने केंद्र (Center) के साथ एक नई ध्रुवीयता (New Polarity) का निर्माण करता है।

और तब स्व-अस्तित्व (Selfhood) का इलेक्ट्रॉन (Electron)—एक नया स्व-अस्तित्व—जन्म लेता है...."

"जब परमेश्वर ने अपने 'आई एएम प्रेज़ेन्स' (I AM Presence)—अर्थात् अपने अस्तित्व की व्यक्तिगत दिव्य चिंगारी (Individualized Spark of Being)—के माध्यम से स्वयं को बार-बार अभिव्यक्त किया, तब वे बीज, जो आगे चलकर जीवात्माएँ (Souls) बने, अर्थात् वे जीवात्माएँ जो आत्मा (Spirit) के लोकों से प्रक्षेपित हुई थीं, पदार्थ (Matter) के लोकों में जीवित जीवात्माएँ बन गईं।

...उदित होती हुई इन जीवात्माओं ने पदार्थ के तंतुओं (Skeins of Matter) को एकत्रित करके समय और स्थान के भीतर स्व-अस्तित्व (Selfhood) के वाहनों (Vehicles) का निर्माण किया—जिनमें मन (Mind), स्मृति (Memory), भावनाएँ (Emotions) तथा भौतिक शरीर (Physical Form) से बँधी हुई चेतना सम्मिलित थी।

इस प्रकार मांस और रक्त (Flesh and Blood) के आवरण से आच्छादित होकर, जीवात्मा समय और स्थान के क्षेत्र में अपनी यात्रा करने के लिए सुसज्जित हो गई।"

— El Morya, The Chela and the Path: Keys to Soul Mastery in the Aquarian Age, अध्याय 3

जीवात्मा का केंद्र चक्र

"जीवात्मा (Soul) का निवास-स्थान 'जीवात्मा का आसन चक्र' (Seat-of-the-Soul Chakra) है। यह चक्र मूलाधार चक्र (Base-of-the-Spine Chakra) और मणिपूर चक्र (Solar-Plexus Chakra) के बीच मध्य में स्थित होता है। मणिपूर चक्र नाभि (Navel) के स्थान पर स्थित है।

परमेश्वर जीवात्मा को यह आह्वान करते हैं कि वह 'जीवात्मा के आसन चक्र' से ऊपर की ओर चेतना की सर्पिल सीढ़ी (Spiral Staircase) पर आरोहण करे और हृदय के गुप्त कक्ष (Secret Chamber of the Heart) तक पहुँचे, जहाँ उसका मिलन उसके प्रिय पवित्र मसीह स्वरूप (Holy Christ Self) से होता है।"

"जीवात्मा का आसन चक्र (Seat-of-the-Soul Chakra) वह स्थान है जहाँ जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप (Real Self) तथा अवास्तविक या अहंकार-आधारित स्वरूप (Not-Self) के संबंध में आत्मज्ञान प्राप्त करती है।

यहीं जीवात्मा अपने समग्र व्यक्तित्व (Integral Soul-Personality) के प्रति आत्म-सचेत जागरूकता (Self-conscious Awareness) प्राप्त करती है, जो एक ओर आंशिक रूप से परमेश्वर के साथ एकीकृत (Partially Integrated in God) है और दूसरी ओर आंशिक रूप से अवास्तविक स्व (Not-Self) के साथ जुड़ा हुआ है।

ये दोनों अवस्थाएँ उन चुनावों (Choices) का परिणाम हैं, जो जीवात्मा ने अनेक जन्मों (Many Lifetimes) के दौरान किए हैं।"

"जिन लोगों ने युद्ध-कलाओं (Martial Arts) का अध्ययन किया है, वे जानते हैं कि जीवात्मा का आसन चक्र (Seat-of-the-Soul Chakra) शरीर का संतुलन-बिंदु (Point of Equilibrium) है। यही 'ची' (Chi) का केंद्र है—वह आंतरिक ऊर्जा या जीवन-शक्ति (Life-force) जो जीवन के संरक्षण के लिए आवश्यक मानी जाती है।

यह सिखाया जाता है कि इसी गुरुत्व-केंद्र (Center of Gravity) अथवा जीवन-केंद्र (Life Center) से 'ची' का वितरण शरीर के शेष भागों में होता है। जहाँ तक भौतिक ऊर्जा का संबंध है, यह बात सत्य है, क्योंकि जीवात्मा की जागरूकता (Soul-awareness) में मनोचेतना (Psyche) इस ऊर्जा को स्वतंत्र रूप से केंद्रित और प्रवाहित करती है।

किन्तु पवित्र अग्नि (Sacred Fire) का अंतिम केंद्र और वितरण-स्थल हृदय (Heart) है। यही वह स्थान है जहाँ पवित्र अग्नि, जो आई एएम प्रेज़ेन्स (I AM Presence) अर्थात् पिता (Father) से क्रिस्टल कॉर्ड (Crystal Cord) के माध्यम से अवतरित होती है, तथा माता (Mother) के मूलाधार चक्र (Base-of-the-Spine Chakra) से ऊपर उठती है, एकत्रित होकर समस्त अस्तित्व में वितरित होती है।"

"जीवात्मा के आसन चक्र (Seat-of-the-Soul Chakra), जो संतुलन का केंद्र (Center of Equilibrium) है, के भीतर से जीवात्मा ऐसी अंतःप्रज्ञा (Inner Intuitive Knowing) द्वारा जानती है, जिसे बाहरी मन (Outer Mind) या तो समझ नहीं पाता या स्वीकार नहीं करना चाहता। वह उन सत्यों को भी जानती है जिन्हें भावनाएँ (Emotions) कर्मजन्य वास्तविकताओं (Karmic Realities) का सामना करने के भय से दबा देती हैं।

जीवात्मा जानती है कि पृथ्वी पर क्या घटित होने वाला है। वह अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों का ज्ञान रखती है। वह इस जीवन में हमारे मानसिक संस्कारों (Mental Indoctrination) और भावनात्मक प्रोग्रामिंग (Emotional Programming) से स्वतंत्र होकर सभी बातों को जानती है।

दुर्भाग्यवश, जन्म के समय चेतन मन (Conscious Mind) का जीवात्मा के साथ जो स्वाभाविक संपर्क होता है, वह मानसिक और भावनात्मक शरीरों (Mental and Emotional Bodies) के विकसित होने के साथ धीरे-धीरे कम हो जाता है।

किन्तु बैंगनी ज्वाला (Violet Flame) का नियमित और प्रतिदिन किया गया अभ्यास चेतन और अवचेतन (Subconscious) के बीच की बाधाओं, बाहरी मानसिक जागरूकता (Outer Awareness of the Mind) और जीवात्मा की आंतरिक जागरूकता (Inner Awareness of the Soul) के बीच के आवरणों का रूपांतरण (Transmutation) कर देता है।"

जीवात्मा का लक्ष्य

"इस वर्तमान अवतार (Embodiment) में जीवात्मा का लक्ष्य यह है कि वह अपने स्थान, अर्थात् सातवें किरण-चक्र (Seventh Ray Chakra) से ऊपर उठकर मणिपूर चक्र (Solar Plexus Chakra) के स्तर तक पहुँचे। यहाँ उसे अपनी इच्छाओं (Desires) से संचित प्रवृत्तियों (Momentums) का सामना करना होता है, अपनी भावनाओं तथा भावनात्मक शरीर (Emotional Body) पर नियंत्रण प्राप्त करना सीखना होता है, और साथ ही अपने पूर्व कर्मों (Past Karmic Records) के अभिलेखों का भी समाधान करना होता है।

माता मरियम (Mother Mary) को अपना आदर्श बनाकर उसे चंद्रमा (Moon) और उसके ज्योतिषीय प्रभावों (Astrology) को अपने चरणों के नीचे रखना होता है।

एक या अधिक आरोहित आचार्यों (Ascended Masters) के मार्गदर्शन में दीक्षा (Initiation) के पथ पर चलते हुए, जहाँ वह अपने पूर्व कर्मों के अभिलेखों का रूपांतरण (Transmutation) करने के लिए बैंगनी ज्वाला (Violet Flame) का आह्वान करती है तथा अपनी रक्षा के लिए महादूत माइकल (Archangel Michael) का आवाहन करती है—यह ईश्वर के साथ पुनर्मिलन की ओर ले जाने वाला सर्वोच्च, सबसे सुरक्षित और सबसे शीघ्र मार्ग (योग) है।"

"जब जीवात्मा मणिपूर चक्र (Solar Plexus Chakra) के स्तर पर आवश्यक परीक्षाओं (Required Tests) को सफलतापूर्वक पार कर लेती है, तब वह हृदय चक्र (Heart Chakra) में अपनी अगली आध्यात्मिक शिक्षा के लिए आगे बढ़ सकती है।

यहाँ उसे दया (Mercy) और करुणा (Compassion) के पाठ सीखने होते हैं। यहीं हृदय की कठोरता (Hardness of Heart) तथा उस निर्दय हृदय (Unmerciful Heart) का रूपांतरण (Transmutation) करना होता है, जिसका उल्लेख बुद्ध (Buddha) ने किया है। इस आंतरिक परिवर्तन की पुष्टि जीवन की सेवा (Service to Life) में किए गए सत्कर्मों (Good Works) और उनके प्रत्यक्ष फलों (Signs) के माध्यम से होती है।

जब जीवात्मा इसके लिए तैयार हो जाती है, तब उसे अष्टम किरण चक्र (Eighth Ray Chakra) में स्थित अपने आंतरिक बुद्ध (Inner Buddha) और आंतरिक मसीह (Inner Christ) की परीक्षाएँ (Testing) प्राप्त हो सकती हैं। यह चक्र बारह पंखुड़ियों वाले हृदय चक्र (Twelve-petaled Heart Chakra) का प्रवेश-कक्ष (Antechamber) है, जहाँ वेदी (Altar) पर त्रिविध ज्योति (Threefold Flame) प्रज्वलित रहती है। यहाँ आंतरिक बुद्ध (Inner Buddha) गुरु (Guru) के रूप में और आंतरिक मसीह (Inner Christ) महायाजक (High Priest) के रूप में विराजमान होते हैं।"

"केवल तब, जब जीवात्मा (Soul) मूलाधार चक्र (Base-of-the-Spine Chakra) से लेकर हृदय चक्र (Heart Chakra) तक के प्रत्येक चक्र-स्तर (Stations of the Chakras) पर बार-बार अपनी दीक्षाओं (Initiations) को सफलतापूर्वक पूर्ण कर लेती है, तभी वह कंठ चक्र (Throat Chakra), आज्ञा चक्र (Third Eye Chakra) और सहस्रार चक्र (Crown Chakra) में वास्तविक आत्म-प्रभुत्व (True Self-Mastery) की ओर अग्रसर हो सकती है।

हृदय चक्र के नीचे स्थित सभी चक्र 'इलेक्ट्रॉनिक बेल्ट' (Electronic Belt) से घिरे हुए हैं, जो हमारे सभी पूर्वजन्मों (Previous Lifetimes) के कर्मों (Karma) का भंडार (Repository) माना जाता है।

जीवात्मा काफी हद तक उन्हीं कर्म-अभिलेखों (Karmic Records) के केंद्र में स्थित रहती है और एक सीमा तक उन्हीं का परिणाम (Product) होती है, क्योंकि वह स्वयं उन कर्मों के निर्माण (Making of Karma) में सहभागी रही है।"

"इस प्रकार कुंभ युग (Age of Aquarius) जीवात्मा (Soul) के लिए उस लंबे समय से प्रतीक्षित अवसर-युग का उद्घाटन करता है, जिसमें वह अपने कर्म (Karma) और उसके परिणामस्वरूप चलने वाले पुनर्जन्म (Wheel of Rebirth) के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर सकती है।

इस मुक्ति का साधन पवित्र अग्नि (Sacred Fire) है, विशेष रूप से पवित्र आत्मा (Holy Spirit) के सातवें किरण (Seventh Ray) का वह स्वरूप, जिसे बैंगनी ज्वाला (Violet Flame) कहा जाता है।"

"बैंगनी ज्वाला (Violet Flame) जीवात्मा (Soul), चक्रों (Chakras) तथा चार निम्न शरीरों (Four Lower Bodies) में विद्यमान असंतुलन (Imbalance) के रूपांतरण (Transmutation) की कुंजी है। अपनी भेदनशील (Penetrating) क्रिया के द्वारा यह जीवात्मा को अवचेतन (Subconscious) में स्थित उन भंडारों (Repository) तक पहुँचने में समर्थ बनाती है, जहाँ पूर्वजन्मों (Past Lives) के कर्म-अभिलेख (Karmic Records) और कर्म (Karma) संचित हैं, साथ ही अचेतन (Unconscious) में स्थित वास्तविक स्वरूप (Real Self) के मूल प्रतिरूप-विरोध (Core Antithesis) तक भी पहुँचने में सहायता करती है।

इन अभिलेखों और नकारात्मक कर्मों (Negative Karma) का रूपांतरण जीवात्मा की मुक्ति (Liberation) के लिए अनिवार्य है। इस रूपांतरण की प्रक्रिया बैंगनी ज्वाला के माध्यम से संपन्न होती है, जब उसे वाचिक वचन के विज्ञान (Science of the Spoken Word) के अनुसार गतिशील डिक्रियों (Dynamic Decrees) द्वारा परमेश्वर से आह्वान (Invoke) किया जाता है।"

"अंततः, जब रूपांतरण (Transmutation) की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है, तब बैंगनी ज्वाला (Violet Flame) व्यक्ति की संपूर्ण चेतना (Consciousness), अस्तित्व (Being) और जीवन-जगत (World) में यांग (Yang) और यिन (Yin) शक्तियों के संतुलन तथा अल्फ़ा (Alpha)—जो परम सत्ता (Deity) के पुरुष अथवा धनात्मक (Plus) पक्ष का प्रतीक है—और ओमेगा (Omega)—जो परम सत्ता के स्त्री अथवा ऋणात्मक (Minus) पक्ष का प्रतीक है—की ध्रुवीयता (Polarity) को पुनः स्थापित कर देती है।

यह उपलब्धि (Achievement) आरोहण (Ascension) की पूर्वपीठिका (Prelude) है और वही लक्ष्य है जिसकी प्राप्ति के लिए सेंट जर्मेन (Saint Germain) के 'कीपर्स ऑफ़ द फ़्लेम' (Keepers of the Flame) प्रतिदिन प्रयासरत रहते हैं।"

आंतरिक बालक

Main article: Inner child

"आरोहित आचार्यों (Ascended Masters) ने जीवात्मा (Soul) को उस बालक के रूप में संबोधित किया है जो हमारे भीतर निवास करता है। मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) ने इसी जीवात्मा को 'अंतःस्थित बालक' (Inner Child) नाम दिया है।

जीवात्मा को चाहे किसी भी नाम से पुकारा जाए, वह अंततः जीवात्मा ही रहती है। और हम उसके माता-पिता भी हैं, उसके शिक्षक भी, और साथ ही उसके विद्यार्थी भी।"

यह भी देखें

आंतरिक बालक

बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म

जीवात्मा की पुनःप्राप्ति

अधिक जानकारी के लिए

Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Path of the Higher Self, volume 1 of the Climb the Highest Mountain® series, pp. 7–11.

स्रोत

Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Path of the Higher Self, volume 1 of the Climb the Highest Mountain® series, pp. 7, 8.

Pearls of Wisdom, vol. 35, no. 58, November 29, 1992.

Pearls of Wisdom, vol. 38, no. 29, July 2, 1995.

एलिज़ाबेथ क्लेयर प्रॉफ़ेट, "आंतरिक बुद्ध का संदेश: आंतरिक बुद्ध की ओर मार्ग पर" (The Message of the Inner Buddha: On the Road to the Inner Buddha), Pearls of Wisdom, vol. 32, no. 28, 9 जुलाई 1989.।