महादेवदूत रेफियल (Archangel Raphael)


महादेवदूत रेफियल सत्य, पूर्णता, चिकित्सा, विज्ञान, समृद्ध जीवन, प्रताप, संगीत, और गणित की पांचवीं किरण के महादूत हैं। इनकी समरूप जोड़ी दिव्य सहायिका मैरी (Mother Mary) हैं, जिन्होंने ईसा मसीह की माँ मरियम के रूप में अवतार लिया था। इनकी किरण आज्ञा चक्र से संबंधित है, और ये हमें आध्यात्मिक दृष्टि और आत्माओं के विवेक की क्षमता प्रदान करने में भी सहायता करते हैं।
यहूदी परंपरा (Jewish tradition)
रेफियल का अर्थ है “ईश्वर ने स्वस्थ किया” या “ईश्वर की औषधि”। एक यहूदी ग्रंथ के अनुसार रेफियल ने नूह (Noah) को पौधों की उपचार शक्ति के बारे में बताया; एक अन्य ग्रंथ में बताया गया है कि उन्होंने एक अंधे व्यक्ति को ठीक किया और एक राक्षस को समाप्त किया। कैथोलिक (Catholics) उन्हें बेथेस्डा (Bethesda) के तालाब पर बीमार लोगों को अच्छा स्वास्थय देने वाले देवदूत के रूप में पूजते हैं। द बुक ऑफ़ एनोक (The Book of Enoch) हमें बताती है कि अस्वस्थ व्यक्तियों को स्वस्थ करना, उनके घावों को भरना महादेवदूत रेफियल () का काम है।
यहूदी परंपरा के अनुसार ये उन तीन प्रधान महादेवदूतों में से एक हैं जो ममरे के मैदान में अब्राहम (Abraham) के सामने प्रकट हुए थे। ऐसा माना जाता है कि रेफियल ने ही अब्राहम की पत्नी सारा को गर्भ धारण करने की शक्ति प्रदान की थी, जबकि वह संतानोत्पत्ति की आयु पार कर चुकी थीं।
रेफियल को यात्रियों का संरक्षक भी माना जाता है। बुक ऑफ़ टोबिट (Book of Tobit) नामक पुस्तक में लिखा है कि जब टोबिट का पुत्र एक लम्बी यात्रा पर निकला तो रेफियल एक यात्री का वेश धारण करके उसके साथ गए थे, और यात्रा के दौरान उसका मार्गदर्शन भी किया। कहानी के अंत में वे अपने वास्तविक रूप में आये और उन्होंने टोबिट को बताया है कि ईश्वर ने उन्हें टोबिट और उसके पुत्र के विश्वास की परीक्षा लेने के लिए भेजा था। पिता-पुत्र परीक्षा में सफल हुए और उन्हें स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिला।
रेफियल और ईसा मसीह का मिशन
जब ईश्वर ने मीन युग के अवतार ईसा मसीह को जन्म देने के मेरी का चुनाव किया और मेरी का जन्म हुआ तब महादेवदूत रेफियल उनके साथ अवतरित नहीं हुए, परन्तु वे इस पूरे समय के दौरान उनके साथ रहे और उन्हें "ईश्वर के पुत्र" को जन्म देने में सहायता की। संत जर्मेन ने, ईश्वर की इच्छानुसार, मेरी के पति जोसफ के रूप में जन्म लिया। संत जर्मेन की समरूप जोड़ी, दिव्य सहायिका पोर्टिया, ने अवतार नहीं लिया, पर वे सदा उनके साथ रहीं।
चिकित्सा विज्ञान
मेरी और रेफियल दुनिया भर के अस्पतालों में सेवा देते है। वे गर्भवती स्त्री और उस संतान के पिता को आंतरिक स्तर पर चार निचले शरीरों के माध्यम से आत्मिक चेतना पाने का प्रशिक्षण देते हैं - ये चार शरीर ही प्रत्येक व्यक्ति के पवित्र आत्मिक स्व का वहन करते हैं। वे वैज्ञानिको, चिकित्सकों और उन सभी लोगों को जो वैकल्पिक उपचार पद्यति से लोगों का उपचार करते हैं - प्रेरित करते हैं।
रेफियल के समूह के सभी देवदूत कुशल शल्य चिकित्सक हैं। रेफियल कहते हैं कि वे "लेजर तकनीक" का उपयोग करके प्रत्येक "कोशिका के आतंरिक केंद्र तक पहुँच जाते हैं, ...अंदर से वायलेट फ्लेम का विस्तार करते हैं" और फिर "कोशिका को उपचार के वैचारिक रूप में सील कर देते हैं।"[1]

वैचारिक उपचार
महादेवदूत रेफियल ने एक वैचारिक उपचार रूप दिया है जो वैज्ञानिक रूप से तैयार किया गया है। जब इसकी कल्पना चार निचले शरीरों या किसी अंग विशेष की कोशिकाओं और परमाणुओं के चारों ओर और उनमें प्रवेश करते हुए की जाती है तो यह मन्युष्य की शुद्ध आंतरिक संरचना और दिव्य पूर्णता को बहाल करता है। यह सफेद, नीलम जैसे नीले और पन्ना जैसे हरे पवित्र अग्नि के संकेंद्रित गोलों से बना है। इसके केंद्र में एक सफेद गोला है जो आंतरिक स्तर पर कार्य करके घायल भाग या रोगग्रस्त अंग को पूर्ण रूप से स्वस्थ करता है। इसके बाद नीला गोला आता है जो सुरक्षा देता है और ईश्वर की इच्छा को स्थापित करता है। बाहर का हरा गोला पदार्थ के माध्यम से आत्मा के प्रवाह को बहाल कर पूर्णता लाता है।
यदि आपको या आपके किसी प्रियजन को चोट लगती है, तो वैचारिक उपचार रूप का आह्वान करें: “ईसा मसीह के नाम पर, प्रिय महादेवदूत रेफियल, माँ, [व्यक्ति का नाम डालें] पर अपना वैचारिक उपचार रूप रखें।” फिर कल्पना करें कि ईश्वर के ह्रदय से पवित्र अग्नि के गोले निकल रहे हैं; कल्पना करें हरी अग्नि में लिपटी चमकीले नीले रंग की लौ की जिसके केंद्र में सफेद अग्नि धधक रही है। दुर्घटना के बाद के पहले कुछ मिनट और घंटे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। अपने मन की आंखों में देखें कि अग्नि के यह गोले घायल व्यक्ति के अंगों को स्वस्थ कर रहे हैं। इस चित्र को अपने मन में स्थिर रखें, इसपर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करें। मन मैं उठती हुई समस्त चिंता, संदेह और भय को शांत करें, किसी भी नकारत्मक भावना को अपने ऊपर हावी न होने दें। केवल वैचारिक उपचार रूप को अपने मन में धारण कारण, उस पर अपना ध्यान केंद्रित करें। धयान को कहीं भटकने न दें। दृढ़ता से यह स्वीकारें कि आपके भीतर मौजूद ईश्वर सब कुछ पूर्ण रूप में देख रहा है, और सभी को उनका वास्तविक स्वरूप दे रहा है।
शुद्ध संकल्पना
महादेवदूत रेफियल और मेरी भी शुद्ध संकल्पना के विज्ञान की शिक्षा देते हैं। स्वर्ग में हर महादेवदूत इस वैज्ञानिक शिक्षा का पालन करता है। जब कोई देवदूत आपको देखता है, तो वह आपको उसी पवित्रता में देखता है, जिस रूप में आप तब थे जब ईश्वर ने आपको पहली बार बनाया था। वे उस छवि को आपके ऊपर धारण करते हैं। इससे आप उस छवि को आत्मसात कर पाते हैं और यह जान पाते हैं कि आप वास्तव में ईश्वर के पुत्र/ पुत्री हैं।
शुद्ध संकल्पना को धारण करने का अर्थ है कि जब आप किसी के बारे में सोचें तो उसके बारे में आलोचनात्मक दृष्टिकोण से न सोचें। उनके चारों ओर ईश्वर की उपस्थिति की कल्पना करें और उन्हें उस पूर्णता में देखें जो आप जानते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें शुरुआत में दी थी। इस पवित्र, निर्मल और निष्कलंक दृष्टि को बनाए रखकर आप लोगों का समर्थन करें। सवयं को भी इसी दृष्टि से देखें। आपको पता है कि आप वास्तव में आत्मा है, ईश्वर का पवित्र अंश हैं, आपकी जीवात्मा में कितनी अपार क्षमता है - आप इसी वास्तविकता को अपने विचारों और भावनाओं में बनाए रखें क्योंकि आपका ऐसा करना ही आपके वास्तविक ईश्वरीय रूप के प्रकटीकरण में आने वाली हर चीज को स्वाभाविक रूप से दूर भगाता है - यह निष्कलंकविचार एक चुंबक बन जाता है जो पवित्र आत्मा की रचनात्मक ऊर्जाओं को आपके भीतर आकर्षित करता है ताकि मन में धारण किए गए प्रतिरूप को पूरा किया जा सके।
मदर मेरी कहती हैं:
याद रखिये कि जहाँ भी उपचार संभव हो वहाँ उपचार के लिए ईश्वर, महादेवदूत रेफियल, मुझे और अनेक देवदूतों से प्रार्थना करें। और यदि विधि का विधान शारीरिक रूप से इसकी अनुमति नहीं देता तो आप आत्मा और मन के उपचार के लिए प्रार्थना करें... हमारा उद्देश्य संपूर्ण मनुष्य का उपचार करना है।[2]
कर्म और उपचार
रेफियल बताते हैं कि उपचार में कर्म की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है:
मेरे प्रियजनों, कर्म एक ऐसी चीज है जिसे बहुत कम लोग समझते हैं। और बहुत से लोग इसके विज्ञान से अनभिज्ञ हैं। बहुत से लोग यह भी मुश्किल से समझ पाते हैं कि किसी भी रोगी के ठीक होने में कर्म की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है - कोई बीमार व्यक्ति ठीक होगा की नहीं यह चिकित्सा के साथ साथ उसके कर्मों पर भी निर्भर करता है।
किसी व्यक्ति को पूर्ण स्वास्थ्य लाभ मिलेगा या वह जीवन के इस चक्र से विमुख हो जाएगा अर्थात मृत्यु को प्राप्त होगा यह उसके कर्मों पर निर्भर करता है। ईश्वर के कानून के अनुसार अगर कर्म का संतुलन अभी होना है तो अगर व्यक्ति ने भक्ति और अच्छे कर्म से अपने आभामंडल को प्रकाशित नहीं किया है तो उसे अपने शरीर में अचानक और तेजी से उभर रहे अंधकार को दूर करने के लिए ईश्वर के प्रकाश की पर्याप्त मात्रा नहीं मिल पाती।कर्म के संतुलन के समय स्थिति विकट होती है और व्यक्ति उस समय ईश्वर की साधना नहीं कर पाता इसलिए पहले से संचित अच्छे कर्म उसके काम आते हैं।
तो क्या यह उचित नहीं कि जब आप काम करने में सक्षम हों, तब अपने शरीर के आभामंडल के प्रकाश को बढ़ाएं और कर्मों को संतुलित करके, कठिन दिनों के लिए तैयारी करें? “प्रकाश में रहते हुए काम करो” का वास्तविक अर्थ यही है, [3] जो ईसा मसीह ने अपने शिष्यों को बताया था। इसका अर्थ है: जब आपके भीतर प्रकाश की शक्ति हो, तब अपने कर्मों को संतुलित करें ताकि आप उन सेवाओं, पवित्र श्रम और प्रार्थना एवं पुष्टि के पवित्र अभ्यास को कर सकें जो कर्मों के समीकरण में परिवर्तन ला सकते हैं। [4]
हम अपने कर्मों को रोग के रूप में प्रकट होने से पहले ही परिवर्तित करने के लिए वायलेट फ्लेम का आह्वान कर सकते हैं। यदि हम अपनी शारीरिक और मानसिक समस्याओं पर वायलेट फ्लेम का प्रयोग करें तो हम स्वस्थ हो सकते हैं। रोग के मूल कारणों से निपटने के इस दृष्टिकोण के विपरीत, कुछ चिकित्सक सम्मोहन या मानसिक तल्लीनता का उपयोग करके रोग के अस्तित्व को ही नकार देते हैं। वे शारीरिक रोग को भावनात्मक शरीर, मानसिक शरीर या सूक्ष्म शरीर में वापस धकेल देते हैं। रोगी स्वस्थ प्रतीत होता है, लेकिन चूँकि यहाँ कर्म को दबा दिया गया है, वह भविष्य में - इस जीवन में या आनेवाले किसी जन्म में - पुनः प्रकट होता है।
महादेवदूत रेफियल कहते हैं कि इस जीवन में या पिछले किसी जीवन में रोग के कारण को मिटाए बिना उसके लक्षणों को दूर करना जीवात्मा के लिए अत्यधिक हानिकारक है। और जो व्यक्ति इस प्रकार के आसान "इलाज" को स्वीकार करता है, उसे किसी न किसी समय, कहीं न कहीं, इस जन्म में या भविष्य के किसी जन्म में फिर उसी समस्या का सामना करना पड़ता है जिसे कर्म के रूप में भुगतना होता है। अगर हम चाहते हैं कि रोग के लक्षण शरीर से स्थायी रूप से गायब हो जाएँ तो उनका रूपांतरण करना आवश्यक है।
आश्रयस्थल
► मुख्य लेख: रेफियल और मेरी का आश्रय स्थल
रेफियल का आश्रम पुर्तगाल के फातिमा शहर के आकाशीय स्तर में है। 1917 में जब मेरी फातिमा में बच्चों के सामने प्रकट हुईं थीं उनके आश्रम की वेदी पर प्रज्वलित उपचारक ज्वाला को भौतिक जगत में स्थापित किया गया था। आज भी आकाशीय स्तर में स्थित इस मंदिर से प्रकाश की एक शक्तिशाली धारा झरने की तरह बहती हुई भौतिक स्तर पर आती है, यहाँ आनेवाले तीर्थयात्री इस उपचारक ज्वाला के "जल" से स्वस्थ होते हैं।
रेफियल और मदर मेरी हमें अपने आश्रम में आने और चिकित्सा विज्ञान का अध्ययन करने के लिए आमंत्रित करते है:
हमारा आध्यात्मिक आश्रम पुर्तगाल के फातिमा द्वीप के ऊपर स्थित है, आप मुझे और रफाएल को पुकार सकते हैं। वहां आप रात में आ सकते हैं [जब आपकी आत्मा नींद की अवस्था में भौतिक शरीर से अलग होकर आध्यात्मिक वस्त्र धारण करती है] और चिकित्सा कलाओं का अध्ययन कर सकते हैं। पास ही क्रेते द्वीप के ऊपर हिलारियन की आत्मा का विश्वविद्यालय स्थित है।
तो फिर आप अपने ईश्वर और संरक्षक देवदूतों से प्रार्थना करें कि वे रात्रि में आपके सूक्ष्म शरीरों में ले जाएं, जहां आप स्वर्ण युग की चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन और ज्ञान प्राप्त कर सकें और यह जान सकें कि जब पृथ्वी एक विशेष कर्म और उन पथभ्रष्ट देवदूतों के समूह से मुक्त हो जाएगी जो कैंसर और अन्य असाध्य रोगों के लिए आज उपलब्ध वास्तविक उपचारों का विरोध करते हैं, तो आपके और अन्य लोगों के माध्यम से अंततः मुक्ति और सच्ची चिकित्सा कलाओं का रहस्योद्घाटन हो सकता है।[5]
महादेवदूत रेफियल का मूल राग एलिस हॉथोर्न द्वारा रचित "व्हिस्परिंग होप" है। रफाएल ने हैंडेल को "मसीहा" का संगीत रचने के लिए प्रेरित किया था।
स्रोत
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Masters and Their Retreats, s.v. “रफाएल”
- ↑ महादेवदूत रेफियल, "द डे ऑफ़ द कमिंग ऑफ़ लार्ड'स एंजेल," Pearls of Wisdom, vol. २९, no. ३२, २९ जून, १९८६.
- ↑ मदर मेरी, “द वाओ टू हील अ प्लेनेट,” Pearls of Wisdom, vol. ३०, no. ७, १५ फरवरी, १९८७.
- ↑ जॉन ९:४, ५; १२:३५, ३६.
- ↑ महादेवदूत राफेल, “हीलिंग, कर्मा एंड द पाथ,” Pearls of Wisdom, vol. २९, no. ३२, २९ जून, १९८६.
- ↑ मदर मेरी, “द वाओ टू हील अ प्लेनेट,” Pearls of Wisdom, vol. ३०, no. ७, १५ फरवरी, १९८७.