आदि पाप/मूल पाप (Original sin)
यीशु (Jesus) को ईश्वर के रूप में उनकी विशिष्ट और सर्वोच्च स्थिति प्रदान करने वाले आधिकारिक धार्मिक आदेशों (decrees) का समर्थन करने के लिए, प्रारंभिक ईसाई चर्च के नेतृत्व ने कई सहायक सिद्धांत (doctrines) विकसित किए। इनमें से एक सिद्धांत "मूल पाप" (Original Sin) का है।
रोमन कैथोलिक चर्च में आज इस सिद्धांत के अनुसार, आदम (Adam) के पतन (Fall) के परिणामस्वरूप मानव जाति का प्रत्येक व्यक्ति एक वंशानुगत नैतिक दोष (hereditary moral defect) के साथ जन्म लेता है और मृत्यु के अधीन होता है।
पाप के इस जन्मजात दाग (inherited stain of sin) के कारण कोई भी मनुष्य परमेश्वर की उद्धारकारी कृपा (saving act of God) के बिना न तो अपनी नैतिक पूर्णता (decency) प्राप्त कर सकता है और न ही अपने अंतिम उद्देश्य या नियति (destiny) को।
रोमन चर्च के अनुसार, यह उद्धार यीशु मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान (resurrection) के माध्यम से संभव होता है।
"रोमन चर्च ने 'मूल पाप' (Original Sin) के अपने सिद्धांत के माध्यम से पूरी मानव जाति को असफलता के लिए अभिशप्त (doom) कर दिया है, सिवाय इसके कि वे यीशु मसीह की उद्धारकारी कृपा (saving grace) प्राप्त करें। लेखक का दावा है कि यह ऐसा नियम है जो परमेश्वर का नियम नहीं है और जैसा चर्च ने घोषित किया है, उसे पूरा करना भी संभव नहीं है।"
Origins of the doctrine

"अधिकांशतः, प्रारंभिक प्रेरितकालीन चर्च-पिताओं (Early Apostolic Fathers) की शिक्षाओं में 'मूल पाप' (Original Sin) की अवधारणा का लगभग कोई स्पष्ट चिन्ह नहीं मिलता। उनका विश्वास था कि कोई भी पाप मनुष्य को उसकी स्वतंत्र इच्छा (Free Will) के द्वारा अच्छाई को बुराई पर चुनने से नहीं रोक सकता।"
प्रारंभिक धर्मशास्त्रियों (theologians) ने यह विचार प्रस्तुत किया था कि मनुष्य की दुःखद और पतित स्थिति किसी न किसी रूप में अदन की वाटिका (Garden of Eden) में आदम और हव्वा के पतन (Fall) से जुड़ी हुई है। लेकिन संत ऑगस्टीन (ईस्वी 354–430) ने इस विचार को व्यवस्थित रूप देकर उस सिद्धांत का रूप दिया, जो आज भी ईसाई धर्मशास्त्र की एक आधारशिला (cornerstone) माना जाता है—'मूल पाप' (Original Sin)।
ऑगस्टीन का तर्क था कि अच्छे लोगों के साथ भी बुरी घटनाएँ इसलिए घटती हैं क्योंकि सभी मनुष्य स्वभाव से ही पापी या बुरे हैं। उनके अनुसार, इस प्राकृतिक पापपूर्ण प्रवृत्ति पर विजय पाने का एकमात्र तरीका यह है कि मनुष्य चर्च के माध्यम से परमेश्वर की कृपा (God's grace) प्राप्त करे।
जैसा कि ऑगस्टीन ने लिखा था:
"कोई भी व्यक्ति अच्छा नहीं होगा, यदि वह पहले बुरा न रहा हो।"
संत ऑगस्टीन, सिटी ऑफ गॉड (City of God), पुस्तक 15, अध्याय 1; फिलिप शैफ (Philip Schaff) द्वारा संपादित A Select Library of Nicene and Post-Nicene Fathers of the Christian Church, प्रथम श्रृंखला (पुनर्मुद्रण, ग्रैंड रैपिड्स, मिशिगन: डब्ल्यू. एम. बी. एर्डमन्स पब्लिशिंग, 1979–80), खंड 2, पृष्ठ 285। [[1]]
यद्यपि बाद में चर्च ने ऑगस्टीन के कुछ तर्कों को अस्वीकार कर दिया, फिर भी कैथोलिक चर्च की धर्मशिक्षा-पुस्तक (Catechism) आज भी कहती है:
"हम मूल पाप (Original Sin) के प्रकाशन/प्रकट सत्य (revelation) के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने से मसीह (Christ) के रहस्य को कमजोर कर देंगे।" "कैथोलिक चर्च की धर्मशिक्षा-पुस्तक (Catechism of the Catholic Church), अनुच्छेद (पैराग्राफ) 389, पृष्ठ 98।"
चर्च का तर्क है कि मूल पाप और मसीह के बीच इतना घनिष्ठ संबंध इसलिए है क्योंकि मसीह ही हमें मूल पाप से मुक्त करते हैं।
ऑगस्टीन का विश्वास था कि आदम और हव्वा शारीरिक अमरता (physical immortality) की अवस्था में रहते थे। यदि उन्होंने निषिद्ध फल (forbidden fruit) का स्वाद न चखा होता और इस प्रकार परमेश्वर की कृपा का विशेषाधिकार न खोया होता, तो वे न कभी बूढ़े होते और न ही उनकी मृत्यु होती।
उनके पतन (Fall) के बाद, मनुष्यों ने दुःख, बुढ़ापा और मृत्यु का अनुभव करना शुरू किया।
ऑगस्टीन के अनुसार, जब मसीह (Christ) पृथ्वी पर आए, तो उन्होंने लोगों को परमेश्वर की कृपा (state of grace) की स्थिति में पुनः स्थापित होने का अवसर प्रदान किया।
वे परमपिता परमेश्वर (the Father) और उसकी आज्ञा न मानने वाली सृष्टि (disobedient creation) के बीच मध्यस्थ (mediator) का कार्य करते हैं।
यद्यपि मसीह का हस्तक्षेप (intercession) लोगों को शारीरिक मृत्यु से नहीं बचाएगा, फिर भी वह उन्हें शारीरिक पुनरुत्थान (bodily resurrection) के माध्यम से फिर से शारीरिक अमरता (physical immortality) की अवस्था में लौटने का अवसर देगा।
परमेश्वर की कृपा (Grace) पृथ्वी पर उनके साथ बुरी घटनाओं को होने से नहीं रोकेगी, लेकिन मृत्यु के बाद उनकी अमरता (eternal life) की गारंटी देगी।
मूल पाप (Original Sin) का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि क्योंकि हम आदम की संतान हैं, इसलिए हम उसके स्थायी रूप से दोषपूर्ण (flawed) स्वभाव को विरासत में प्राप्त करते हैं।
ऑगस्टीन लिखते हैं:
"मनुष्य के पास स्वयं अच्छा बनने की शक्ति नहीं है।"
उनका विश्वास था कि मनुष्य अपने बल पर भलाई करने में उतना ही असमर्थ है जितना कि कोई बंदर बोलने में।
मनुष्य केवल परमेश्वर की कृपा (Grace) के द्वारा ही अच्छा कार्य कर सकता है।
"यौन संबंध (Sex) के बारे में संत ऑगस्टीन के विचार
यौन संबंध (Sex) के बारे में ऑगस्टीन के विचारों ने हमारी सभ्यता पर भी गहरा प्रभाव डाला है। लेखक के अनुसार, यह धारणा कि सेक्स स्वभावतः (inherently) बुरा है, उसे फैलाने में ऑगस्टीन की भूमिका सबसे अधिक थी।
ऑगस्टीन ने यौन इच्छा को मनुष्य की पतित (fallen) अवस्था का सबसे स्पष्ट संकेत माना।
विदुषी एलेन पैगेल्स (Elaine Pagels) के शब्दों में, ऑगस्टीन यौन इच्छा को मूल पाप (Original Sin) का "प्रमाण" (proof) और उसकी "सज़ा" (penalty) दोनों मानते थे। [3]
सदियों से स्टोइक (Stoics), पाइथागोरियन (Pythagoreans) और नियोप्लेटोनिस्ट (Neoplatonists) जैसे अनेक समूह यह सिखाते रहे थे कि यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने से आत्मा को शरीर के बंधनों से मुक्त होने में सहायता मिलती है।
लेकिन ऑगस्टीन ने इससे भी अधिक कठोर दृष्टिकोण अपनाया और माना कि यौन संबंध (sex), यहाँ तक कि विवाह के भीतर भी, बुराई से जुड़ा हुआ है।
ऑगस्टीन के अनुसार, यौन इच्छा (sexual desire), यहाँ तक कि वह इच्छा भी जो संतान उत्पत्ति (procreation) की ओर ले जाती है, बुराई से जुड़ी हुई है।
ऑगस्टीन का विश्वास था कि वासना (lust) और मृत्यु (death) एक ही समय में संसार में प्रवेश किए।
यदि आदम ने पाप न किया होता, तो उसकी कभी मृत्यु न होती।
और उसके पाप की सज़ा केवल बूढ़ा होना और मरना ही नहीं थी, बल्कि अनियंत्रित वासना का अनुभव करना भी थी।
इस प्रकार, ऑगस्टीन के अनुसार, यौन इच्छा आदम और हव्वा के पतन (Fall) का प्रत्यक्ष परिणाम थी।
ऑगस्टीन का विश्वास था कि आदम की सभी संतानों पर उसकी वासना (lust) का प्रभाव पड़ा है।
उनके शब्दों में, आदम की "शारीरिक वासना" (carnal concupiscence) ने "उसकी वंशावली से उत्पन्न होने वाले सभी लोगों को भ्रष्ट कर दिया।"
दूसरे शब्दों में, लेखक के अनुसार, एक व्यक्ति (आदम) की वासना के कारण सभी बच्चे पापी अवस्था में जन्म लेते हैं। [4]
इस शिक्षा (teaching) से यह विचार उत्पन्न होता है कि विवाह, संतानोत्पत्ति (procreation) और स्वयं शिशु भी मूल पाप (Original Sin) से प्रभावित हैं।
लेखक का कहना है कि जब चर्च यह सिखाता है कि हम यौन संबंध (sexual act) के माध्यम से गर्भधारण होने के कारण जन्म से ही पापी हैं, तो वह हम सभी पर दोष और निंदा (condemnation) का बोझ डाल देता है।
लेखक के अनुसार, यह अपराधबोध (guilt) हमारे अवचेतन (subconscious) स्तर तक प्रभाव डालता है और अनेक कैथोलिकों तथा पूर्व कैथोलिकों के लिए मानसिक बोझ बन जाता है।
लेखक यह भी कहता है कि कुछ प्रोटेस्टेंट ईसाई भी इससे प्रभावित हुए, क्योंकि उन्होंने प्रोटेस्टेंट सुधार आंदोलन (Protestant Reformation) के नेताओं मार्टिन लूथर (Martin Luther) और जॉन कैल्विन (John Calvin) की शिक्षाओं के माध्यम से इन विचारों को अपनाया।
जब चर्च यीशु को मूल पाप (Original Sin) से मुक्त घोषित करता है, तो वह उन्हें हम बाकी मनुष्यों से और भी अधिक अलग कर देता है।
लेखक का तर्क है कि जब यह कहा जाता है कि हम सभी पापी हैं और यीशु कभी पापी नहीं थे, तो इससे हमारे भीतर मसीह के पदचिह्नों पर चलकर परमेश्वर की संतान (Sons of God) बनने की संभावना कम हो जाती है या हमसे छीन ली जाती है।

आदम के पाप को विरासत में प्राप्त करना
ऑगस्टीन को अपने "मूल पाप" (Original Sin) के सिद्धांत के लिए मुख्य बाइबिलीय समर्थन रोमियों (Romans) 5:12 में मिला।
आधुनिक New Revised Standard Version (NRSV) अनुवाद में यह पद इस प्रकार है:
"एक मनुष्य के द्वारा पाप संसार में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई; और इस प्रकार मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सबने पाप किया है।"
लेकिन ऑगस्टीन के पास इस पद (Romans 5:12) का जो संस्करण था, उसमें अनुवाद की एक त्रुटि (mistranslation) थी।
ऑगस्टीन यूनानी (Greek) भाषा नहीं पढ़ सकते थे, जो कि नए नियम (New Testament) की मूल भाषा थी। इसलिए उन्होंने लैटिन अनुवाद का उपयोग किया, जिसे आज वुल्गेट (Vulgate) कहा जाता है।
वुल्गेट में इस पद का अंतिम भाग इस प्रकार अनुवादित था:
"और इस प्रकार मृत्यु एक मनुष्य के द्वारा सब मनुष्यों में फैल गई, जिसमें (in whom) सभी मनुष्यों ने पाप किया।" [5]
ऑगस्टीन ने निष्कर्ष निकाला कि "जिसमें" (in whom) शब्द आदम की ओर संकेत करता है, और किसी प्रकार सभी लोगों ने आदम के पाप करने के समय उसी में पाप किया था।
ऑगस्टीन ने आदम को एक प्रकार का "सामूहिक व्यक्तित्व" (corporate personality) माना, जिसमें भविष्य में आने वाले सभी मनुष्यों का स्वभाव निहित था और जो उसकी संतानों तक उसके वीर्य (semen) के माध्यम से पहुँचता था।
ऑगस्टीन ने लिखा:
"हम सब उस एक मनुष्य (आदम) में थे।"
यद्यपि उस समय हमारा भौतिक शरीर अस्तित्व में नहीं था, फिर भी "वह बीजात्मक (seminal) प्रकृति पहले से ही वहाँ मौजूद थी, जिससे आगे चलकर हमारी उत्पत्ति होने वाली थी।" [6]
इस प्रकार, ऑगस्टीन के अनुसार आदम की सभी संतानों को भ्रष्ट (corrupt) और दोषी (condemned) माना जाता है, क्योंकि जब आदम ने पाप किया तब वे किसी न किसी रूप में उसके भीतर (बीज/वीर्य के रूप में) उपस्थित थीं।
ऑगस्टीन ने इस पाप को ऐसी चीज़ बताया जो "संक्रमित" (contracted) होती है और पूरी मानव जाति में एक यौन-संचारित रोग (venereal disease) की तरह फैलती है। [7]
रूढ़िवादी (orthodox) ईसाई विश्वास के अनुसार, यीशु मूल पाप (Original Sin) से मुक्त थे क्योंकि उनका गर्भाधान (conception) सामान्य मानवीय वीर्य (semen) के माध्यम से नहीं हुआ था।
ऑगस्टीन ने निष्कर्ष निकाला कि आदम के पाप के परिणामस्वरूप पूरी मानव जाति "बुराई की एक श्रृंखला" (train of evil) बन गई है, जो "दूसरी मृत्यु" (second death) के विनाश की ओर बढ़ रही है।
[8] लेकिन, निश्चित रूप से, वे लोग इससे बच सकते हैं जो चर्च के माध्यम से परमेश्वर की कृपा (God's grace) प्राप्त कर लेते हैं।
ऑरेंज की धर्मसभा" या "ऑरेंज परिषद
पाँचवीं शताब्दी में "मूल पाप" (Original Sin) एक बड़े धार्मिक विवाद का केंद्र बन गया। इस विवाद का अंतिम निर्णय 529 ईस्वी में ऑरेंज की धर्मसभा (Synod of Orange) द्वारा किया गया।
धर्मसभा ने घोषित किया कि आदम के पाप ने पूरी मानव जाति के शरीर और आत्मा को भ्रष्ट कर दिया है। पाप और मृत्यु, आदम की आज्ञा-अवज्ञा (disobedience) का परिणाम हैं।
धर्मसभा ने यह भी कहा कि पाप के कारण मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा (free will) इतनी कमजोर हो गई है कि "कोई भी व्यक्ति परमेश्वर से वैसा प्रेम नहीं कर सकता जैसा उसे करना चाहिए, न परमेश्वर पर विश्वास कर सकता है, और न ही परमेश्वर के लिए कोई अच्छा कार्य कर सकता है, जब तक कि पहले उस पर ईश्वरीय दया (divine mercy) की कृपा न हो।"
उन्होंने यह भी घोषित किया कि बपतिस्मा (baptism) के संस्कार के द्वारा मिलने वाली कृपा से सभी मनुष्य, यदि वे प्रयास करें, तो उद्धार प्राप्त कर सकते हैं।
इस प्रकार, उद्धार (salvation) के लिए मानव के अपने गुणों (human merit) से अधिक महत्वपूर्ण परमेश्वर की कृपा (grace) मानी गई।
मूल पाप (Original Sin) पर हुई बहस के परिणाम में बहुत कुछ दाँव पर लगा हुआ था।
यह विवाद चर्च की भूमिका को कमजोर कर सकता था, जो वह अपने विश्वासियों (communicants) के जीवन में निभाता था।
चर्च सिखाता था कि बपतिस्मा (Baptism) वह माध्यम है जिसके द्वारा विश्वासियों को चर्च में शामिल किया जाता है और उन्हें परमेश्वर की कृपा (Grace) प्राप्त होती है।
चर्च यह भी मानता था कि कृपा का जीवन (life of grace) विभिन्न संस्कारों (Sacraments) के द्वारा बनाए रखा जाता है।
यदि मूल पाप को धोने और उद्धार (Salvation) प्राप्त करने के लिए बपतिस्मा आवश्यक न माना जाए, तो चर्च और उसके पादरियों (clergy) की आवश्यकता कम हो जाएगी या वे अनावश्यक (expendable) समझे जा सकते हैं।
आज कैथोलिक मानते हैं कि यद्यपि बपतिस्मा (Baptism) का संस्कार मूल पाप (Original Sin) को धो देता है, फिर भी मनुष्य में पाप करने की प्रवृत्ति बनी रहती है।
लेखक का कहना है कि यह एक आत्म-विरोधाभास (self-contradiction) है।
वह प्रश्न उठाता है: यदि यीशु मसीह का बपतिस्मा हमें पाप की भावना या पाप करने की प्रवृत्ति से पूरी तरह मुक्त नहीं कर सकता, तो उसकी शक्ति कितनी प्रभावी मानी जाए?
आज की Catholic Encyclopedia (कैथोलिक विश्वकोश) में "Original Sin" (मूल पाप) शीर्षक के अंतर्गत कहा गया है कि:
"‘मूल पाप’ शब्द उस दोष (guilt), दुर्बलता (weakness) या कमजोरी (debility) की अवस्था को दर्शाता है जो ऐतिहासिक रूप से मनुष्यों में पाई जाती है, और जो उनके द्वारा अच्छाई या बुराई चुनने के लिए स्वतंत्र निर्णय (free option) लेने से पहले ही मौजूद होती है। ... यह एक अवस्था (state of being) है, न कि कोई मानवीय कार्य (human act) या उसके परिणाम।"
अर्थात, कैथोलिक शिक्षा के अनुसार मूल पाप कोई ऐसा व्यक्तिगत पाप नहीं है जिसे व्यक्ति स्वयं करता है, बल्कि यह एक ऐसी स्थिति या अवस्था है जिसमें मनुष्य जन्म लेता है। [9]
मानव-पतन को समझने का एक विस्तृत दृष्टिकोण
पुरुष और स्त्री, अपनी निष्कलंकता (innocence) के श्वेत-अग्नि (white-fire) केंद्र में एकीकृत (androgynous) अवस्था में थे और अदन (Eden) की चेतना में पूर्णता (wholeness) का अनुभव करते थे।
मसीह-ज्योति (Christ Flame) के दुरुपयोग के कारण उन्होंने अपनी वह पूर्णता खो दी और वे प्रभु परमेश्वर के सामने नग्न खड़े हो गए।
इस प्रकार, लेखक के अनुसार, लूसीफेरियों (Luciferians) का मूल पाप — जिसने पहले मानव जाति के पतन और फिर आदम और हव्वा के पतन को जन्म दिया — 'त्रिगुण ज्योति' (Threefold Flame) का दुरुपयोग था, अर्थात् पिता (Father), पुत्र (Son) और पवित्र आत्मा (Holy Spirit) की शक्ति का विकृतिकरण (perversion)।
तुरंत ही, आदम और हव्वा द्वारा त्रिगुण ज्योति (Threefold Flame) के दुरुपयोग से एक नकारात्मक चक्र (negative spiral) उत्पन्न हुआ, जिसने "इलेक्ट्रॉनिक बेल्ट" (Electronic Belt) का निर्माण किया।
और पवित्रता का श्वेत-अग्नि केंद्र (White-Fire Core of Purity) — जो पदार्थ (Matter) में ऊर्जा का स्रोत और त्रिगुण ज्योति का मूल माना जाता है — मातृ चक्र (Mother Chakra) में सील कर दिया गया।
उसकी रक्षा करूबों (Cherubim) और एक "हर दिशा में घूमने वाली ज्वलंत तलवार" (Flaming Sword) द्वारा की गई, ताकि जीवन-वृक्ष (Tree of Life) तक पहुँचने वाले मार्ग की रक्षा की जा सके।[10]
ईश्वर की ऊर्जा की पुरुष त्रिमूर्ति (masculine trinity) के दुरुपयोग के कारण जो पूर्णता (wholeness) खो गई, उसी ने पुरुष और स्त्री को पदार्थ-लोक (Matter sphere) तक सीमित कर दिया।
अपने भीतर स्थित आत्मिक ध्रुव (inner Spirit polarity) के साथ शुद्ध संपर्क खो देने के कारण वे अब अपने भीतर त्रिगुण ज्योति (threefold flame) में विद्यमान ईश्वर की उभयलिंगी (androgynous) चेतना का अनुभव नहीं कर सके।
इस पूर्णता के खो जाने के कारण वे अब प्रकाश-किरणों (light rays) के प्रक्षेपण द्वारा संतान उत्पन्न करने में सक्षम नहीं रहे, जैसा कि शुक्र ग्रह (Venus) की अधिक विकसित सभ्यताओं द्वारा किया जाता है, जो ईथरिक लोक (etheric plane) से नीचे नहीं उतरी हैं।
पूर्णता की खोज
जब तक पुरुष और स्त्री, पुत्र और पुत्री, अपने हृदय में संतुलित त्रिगुण ज्योति (balanced threefold flame) को अपनी ईश्वरीय पहचान (God-identity) के आत्मिक क्षेत्र (Spirit sphere) के केंद्र के रूप में धारण नहीं करते, तब तक वे भौतिक जगत (Matter plane) में ईश्वर के उभयलिंगी (androgynous) स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकते।
आदम और हव्वा द्वारा भौतिक जगत में अपनी पूर्णता (wholeness) खो देने के परिणामस्वरूप यह कर्म (karma) उत्पन्न हुआ कि हव्वा की इच्छा अपने पति की ओर और आदम की इच्छा अपनी पत्नी की ओर हो गई।
इस प्रकार, भौतिक संसार में पिता-माता परमेश्वर (Father-Mother God) की संपूर्णता का अनुभव करने के लिए दो व्यक्तियों (पुरुष और स्त्री) की आवश्यकता पड़ती है।
आत्मा की अदन (Eden) की उभयलिंगी (androgynous) चेतना के लिए तड़प भौतिक जगत (Matter) में इच्छा (desire) को उत्पन्न करती है।
परमेश्वर के लिए और परमेश्वर के साथ पिता या माता के रूप में पुनर्मिलन (reunion) की इच्छा एक पवित्र इच्छा (holy desire) है।
इस इच्छा की अभिव्यक्ति, अदन की वाटिका के बाहर, संतानोत्पत्ति (procreation) का एक आवश्यक घटक बन जाती है।
उत्पत्ति (Genesis) 4:1 में पहली बार हम पढ़ते हैं कि आदम ने अपनी पत्नी को “जान लिया” (knew his wife)।
लेखक के अनुसार, यौन संबंध (sexual intercourse) मूल पाप (original sin) नहीं है।
मूल पाप वास्तव में “क्राइस्ट चेतना” (Christ consciousness) से दूर हो जाना है—जो व्यक्ति के भीतर स्थित व्यक्तिगत मसीह-स्व (Christ Self) और गुरु (Guru) में प्रकट सार्वभौमिक मसीह उपस्थिति (Universal Christ Presence) की आज्ञा का उल्लंघन करने से होता है।
इस दृष्टिकोण में, यौन संतानोत्पत्ति (procreation through sex) केवल आदमिक वाचा (Adamic covenant) की कई स्थितियों में से एक है, और यह अदन की वाटिका (Garden of Eden) के बाहर गिरे हुए मनुष्य और स्त्री के जीवन की परिस्थितियों का हिस्सा है।
इसलिए, आज पृथ्वी पर जिस प्रकार यौन संबंध (sex) का अभ्यास किया जाता है, वह मूल पाप (Original Sin) का कारण नहीं बल्कि उसका परिणाम (effect) है।
सेक्स स्वयं में पाप नहीं है।
लेकिन मनुष्यों ने यौन क्षेत्र में “पवित्र अग्नि” (sacred fire) के दुरुपयोग को अदन (Garden of Eden) की कृपा से गिरने के बाद सबसे बड़ा पाप बना दिया है।
यह उन्होंने अपनी इच्छा से परमेश्वर-चेतना के सभी पवित्र केंद्रों (sacred centers) — अर्थात् चक्रों (chakras) — में उस पवित्र अग्नि का अपमान करके किया है, जब वे शरीर की वासनाओं (lusts of the flesh) को पूरा करने लगे और दस आज्ञाओं (Ten Commandments) की अवहेलना करने लगे।
चर्च के सात संस्कार (seven sacraments) ऐसे माध्यम हैं जिनके द्वारा पुरुष और स्त्री “सात किरणों” (seven rays) के दुरुपयोग का प्रायश्चित (atonement) कर सकते हैं।
उद्धार प्राप्त पुरुष और स्त्री में, यौन संबंध (sexual intercourse) विवाह के संस्कार (sacrament of marriage) के एक पवित्र अनुष्ठान (sacred ritual) में बदल जाता है।
यह अनुष्ठान मूल पाप (original sin) की अशुद्धता—जो आज्ञा-उल्लंघन (disobedience) से जुड़ी है—और वासना के कारण इस पवित्र क्रिया के अपमान (lustful desecration) से उत्पन्न द्वितीयक पाप (secondary sin) से शुद्ध किया जा सकता है।
यह शुद्धिकरण पुरुष और स्त्री में “क्राइस्ट चेतना” (Christ consciousness) की पुनर्स्थापना के माध्यम से संभव होता है।
दैवीय पुनर्मिलन
जब सात चक्रों (seven chakras) की सात दीक्षाएँ (initiations) पार कर ली जाती हैं और तैंतीस चरण (thirty-three steps) पूरे कर लिए जाते हैं, तब पुरुष और स्त्री भीतर स्थित “एक” की पूर्णता (wholeness of the One) में लौट आते हैं।
जब दोनों इस “अलगाव” (separation) से मुक्त होकर पूर्णता की अवस्था में प्रवेश कर लेते हैं, तब उनकी इच्छा (desire) अब अधूरापन (incompleteness) पर आधारित नहीं रहती, बल्कि केवल वही पवित्र इच्छा (holy desire) रह जाती है जो पिता-माता परमेश्वर (Father-Mother God) की एकता से उत्पन्न होती है।
इस प्रकार के मिलन (union) में कोई पाप नहीं है। यह “दैवीय पुनर्मिलन” (divine reunion) का पुनः-अभिनय है, जिसे आत्मा और आत्म-चेतना के बीच होने वाला “अल्केमिक विवाह” (alchemical marriage) कहा जाता है।
“असेंशन” (ascension) से पहले यह दैवीय पुनर्मिलन पुरुष और स्त्री के बीच हृदय, आत्मा, शरीर और मन के एकत्व के रूप में प्रकट हो सकता है, जो सभी सात चक्रों (chakras) में परमेश्वर की महिमा के लिए होता है।
इस एकता से अब केवल “एक प्रकार का मनुष्य” (carnal mind की वंशावली या शरीर की संतान) उत्पन्न नहीं होता, बल्कि “क्राइस्ट चेतना” (Christ consciousness) के आदर्श रूप (archetypes) उत्पन्न होते हैं, जिनका सर्वोच्च उदाहरण यीशु मसीह (Jesus the Christ) हैं।
परमेश्वर का यह प्रिय पुत्र (यीशु) मरियम की आत्मा और परमेश्वर की आत्मा के पवित्र मिलन से उत्पन्न हुआ, जिसमें पवित्र आत्मा (Holy Spirit) के सर्वोच्च दीक्षित (initiate) संत जर्मेन (Saint Germain) — जो यूसुफ (Joseph) के रूप में अवतरित हुए — की भूमिका बताई गई है।
यीशु “उद्धार प्राप्त स्त्री” का पहला फल (first fruit of woman redeemed) थे।
मरियम “Ma-Ray” अर्थात “मदर रेज़/माता किरण” बन गई थीं। उन्होंने “दस की परीक्षा” (test of the ten) उत्तीर्ण की, जिसे हव्वा (Eve) असफल रही थी।
उनकी कुंवारी अवस्था (virginity) का अर्थ था उनके भीतर स्थित क्राइस्ट चेतना (Christ within) और कॉस्मिक क्राइस्ट (Cosmic Christ) के प्रति उनकी आज्ञाकारिता।
उन्हें निर्देश और दीक्षाएँ (instructions and initiations) उनके भक्त माता-पिता अन्ना (Anna) और जोआकिम (Joachim) के माध्यम से, और एस्सीन मंदिर (Essene temple) में प्रारंभिक प्रशिक्षण के दौरान उनकी बहनों के माध्यम से, तथा अंत में महादूत गेब्रियल (Archangel Gabriel) के माध्यम से प्राप्त हुईं।
यह जन्म पवित्र आत्मा (Holy Spirit) के द्वारा हुआ माना जाता है
► Main article: कुंवारी के द्वारा जन्म (Virgin birth)
Since sex itself is not the original sin, the virgin birth remains the virgin birth with or without sexual intercourse. Mary’s virgin consciousness is the raising-up of the white sphere of the Mother that in unredeemed man and woman remains locked in the base-of-the-spine chakra.
As that light of the Mother rises, it restores the light of the Trinity to each successive chakra, regenerates the balanced threefold flame within the heart, resurrects the Alpha and Omega wholeness as the white-fire core of the seven planes of God’s consciousness, and locks that sphere in the third eye, completing the caduceus.
Over this spiral of energy, sanctified and made pure by the Body (the Matter) and the Blood (the Spirit) of Christ who “before Abraham was, I AM,” the Son of God became the Word incarnate: Jesus the Christ was born.
If it were true that Jesus was pure because his mother, Mary, did not have intercourse with his father, then we could never be pure. The misinterpretation of the virgin birth of Jesus is the lie of the Luciferians that keeps the children of God in self-condemnation and keeps the self-righteous in condemnation of those who are obliged to engage in intercourse to bear the children of God.
The real original sin
The ascended masters teach that the fallen angels are the original sinners, who committed the original sin against God by challenging the Divine Mother and the Divine Manchild. They have led the children of God into paths of sinfulness in order to convince them that they are “sinners” and hence, unworthy to follow in the footsteps of Jesus Christ.
The Luciferians propounded the lie that sex is the original sin in order to keep the light of mankind veiled in the sin consciousness, to keep their attention (hence the serpentine force) constantly revolving around sex as the forbidden fruit. The Luciferians did not want mankind to know that it was their rejection of the Christ that caused them to fall, for if mankind knew this, they could and would accept the redemption of Jesus the Christ, of the Christ Self and of the Initiator Lord Maitreya. Thus they would return to the glory that they knew in the beginning before the world was.
The fallen angels have kept from the children of God the true understanding that God has endowed each of them with the Divine Image; instead they have taught them that they are forever stained by “original sin” and can never become Christlike or realize their own Christ potential. The fallen angels have thus promulgated the false doctrine that because the children of God are sinners, they can only be saved by grace, dispensed by the Church, thereby denying the necessity for each one to “work the works of him that sent me,” as Jesus declared of his own mission.[11]
God has called us to forsake the sinful life of the fallen angels and to put behind us the sense of forever being sinners. This is made possible by the grace of Jesus Christ, which restores our oneness with him and with our own inner Christ potential. This grace affords us the opportunity to atone for our misdeeds and mistakes and pursue our own path of individual Christhood.
The unreality of original sin
Many years ago, the Goddess of Liberty pronounced the fiat that original sin has no ultimate reality, since its origin is not in God:
You have heard, beloved ones, of the doctrine of original sin. I am the spokesman for the Karmic Board, and I tell you, beloved ones, there is no such thing as original sin; for God did not create it, the Cosmic Masters did not create it, and I think that it never has been created. Original sin, beloved ones, is a figment of the human imagination. That which is original is purity, it is the law of life, it is the law of eternal perfection, and it is that which was intended to act in the world of man as it acts in the universe.[12]
And Mother Mary brings the vision of our origin as not being in sin, but in God:
O beloved ones, it does not matter when the moment comes as long as it comes swiftly for you to declare, “Behold, I am begotten of the Lord!” Let that statement cancel out the record of condemnation of original sin upon your soul, and know that the origin of your being is in the immaculate conception of Alpha and Omega. This is your original life, this is your original virtue, this is your original love; and God loves you with that purity that he loved you with in the hour of your soul’s conception in the heart of the Great Central Sun.[13]
See also
For more information
Elizabeth Clare Prophet with Erin L. Prophet, Reincarnation: The Missing Link in Christianity, chapter 20.
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Path of the Universal Christ, pp. 134–40.
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Path of Self-Transformation, pp. 143–50.
Sources
Elizabeth Clare Prophet, December 10, 1988.
Elizabeth Clare Prophet with Erin L. Prophet, Reincarnation: The Missing Link in Christianity, pp. 225–27, 374, 228–29.
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Path of Self-Transformation, pp. 145–49.
Pearls of Wisdom, vol. 33, no. 41, October 21, 1990, endnote.
Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, The Path of the Universal Christ, pp. 137–38, 139–40.
- ↑ Augustine, City of God 15.1, in Schaff, Philip, ed., A Select Library of Nicene and PostNicene Fathers of the Christian Church, 1st ser. (Reprint. Grand Rapids, Mich.: Wm. B. Eerdmans Publishing, 1979–80), 2:285.
- ↑ संत ऑगस्टीन, On Free Choice of the Will (इच्छा की स्वतंत्रता पर), पुस्तक 3, अध्याय 18; यह उद्धरण टी. केरमिट स्कॉट की पुस्तक Augustine: His Thought in Context (न्यूयॉर्क: पॉलिस्ट प्रेस, 1995), पृष्ठ 136–137 में दिया गया है।
- ↑ एलेन पैगेल्स, Adam, Eve, and the Serpent (आदम, हव्वा और सर्प), न्यूयॉर्क: रैंडम हाउस प्रकाशन, 1988, पृष्ठ 112।
- ↑ संत ऑगस्टीन की पुस्तक "On the Merits and Forgiveness of Sins, and on the Baptism of Infants" (पापों के गुण-दोष, क्षमा और शिशुओं के बपतिस्मा पर), पुस्तक 1, अध्याय 10; यह लेख Nicene and Post-Nicene Fathers नामक संग्रह के खंड 5, पृष्ठ 19 में प्रकाशित है।
- ↑ रोमियों (Romans) 5:12; यह उद्धरण जारोस्लाव पेलिकन (Jaroslav Pelikan) की पुस्तक The Emergence of the Catholic Tradition में पृष्ठ 299 पर उद्धृत किया गया है।
- ↑ संत ऑगस्टीन, City of God (ईश्वर का नगर), पुस्तक 13, अध्याय 14; यह लेख Nicene and Post-Nicene Fathers (प्रथम श्रृंखला) के खंड 2, पृष्ठ 251 में प्रकाशित है।
- ↑ संत ऑगस्टीन, Against Julian (जूलियन के विरुद्ध), पुस्तक 3, अध्याय 3; मैथ्यू ए. शूमाकर द्वारा अनूदित, The Fathers of the Church, खंड 35 (वॉशिंगटन, डी.सी.: कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ अमेरिका प्रेस, 1957), पृष्ठ 113।
- ↑ संत ऑगस्टीन, City of God (ईश्वर का नगर), पुस्तक 13, अध्याय 14; Nicene and Post-Nicene Fathers (प्रथम श्रृंखला), खंड 2, पृष्ठ 251। साथ ही प्रकाशितवाक्य (Revelation) 21:8 भी देखें।
- ↑ सी. जे. पीटर (C. J. Peter), "Original Sin" (मूल पाप), New Catholic Encyclopedia (न्यू कैथोलिक एनसाइक्लोपीडिया), न्यूयॉर्क: मैकग्रा-हिल (McGraw-Hill), 1967, पृष्ठ 777।
- ↑ Gen. 3:24.
- ↑ John 9:4.
- ↑ Goddess of Liberty, April 1, 1962.
- ↑ Mother Mary, October 26, 1977.